आप भी देखिये नियुक्ति घोटाला ख़ास रिपोर्ट

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हरिद्वार के जिला पंचायत मे कार्यालय की नियुक्ति मे फर्जीवाड़े का खुलासा आर.टी.आई. मे प्राप्त सूचनाओ से हुआ जिसमें सभी नियमों को दरकिनार करते हुऐ अवैध तरीके से समूह ग के आशुलिपिक पद पर नियुक्ति कर दी गई
शुरु से लेकर आखिर तक इस भर्ती प्रक्रिया में नियमो को ऐसे तोड मरोड कर पेश किया गया है कि पूरे मामले से भ्रष्टाचार की बू आती है संविदाकर्मी के रूप मे भर्ती करवाने से लेकर आशुलिपिक पद स्थाई नियुक्ति होने तक विभाग के शीर्ष अधिकारी गोपाल सिंह पर पूरी तरह से मेहरबान दिखाई दिये वर्ष 2010 में विभाग जब गोपाल सिंह का कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर नियुक्त किया गया तब इनकी भर्ती प्रक्रिया के दौरान अन्य ऐसे 3 लोगों द्वारा परीक्षा देना दिखाया गया जो कहीं ना कहीं गोपाल सिंह से नजदीकी संबंध रखते हैं तथा इंहीं की जाति से संबंधित है यानी जिला पंचायत में कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर नियुक्ति की सूचना केवल गोपाल सिंह तथा उसके नजदीकी रिश्तेदारों को ही पता चली और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार गोपाल सिंह को 4 जुलाई 2010 को विभाग में 1 वर्ष के लिए कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर तैनात किया गया उसके बाद तो विभागीय अधिकारियों ने विशेष सिफारिश कर साल दर साल उसका कार्यकाल भी बढवाया

जिसके लिए हर वर्ष अलग से प्रस्ताव दिलाया गया ताकि गोपाल सिंह को विभाग में नियमित रखा जा सके समय समय पर अन्य विभागो के लिए जारी शासनादेशो का हवाला देकर उसकी वेतन वृद्धि भी की गई

भ्रष्टाचार की सीमाएं तो तब तोड़ दी गई जब वर्ष 2015 में सभी नियमों के विरुद्ध जाकर गोपाल सिंह को आशु लिपिक पद पर स्थाई नियुक्ति की गई जिसके लिए ना तो शासन से अनुमति ली गई और ना ही बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव पास कर आ गया जिला पंचायत में लागू उत्तर प्रदेश जिला पंचायत अधिनियम 1961 के अनुसार ऐसा कोई प्रस्ताव बोर्ड की बैठक में पास करना अनिवार्य है तथा शासन से अनुमति लेना भी अनिवार्य है जो कि इस भर्ती प्रक्रिया में अमल में नहीं लाया गया आश्चर्य की बात तो यह है कि गोपाल सिंह के पास आशुलिपिक का ना तो कोई प्रमाण पत्र है और ना ही उंहें आशुलिपि आती है आसपास मौजूद लोगों का भी यह कहना है कि उन्होंने कभी आशुलिपि लिखी ही नहीं इस मामले में भी विभाग ने नियम विरुद्ध जाकर परीक्षा कराई दरअसल उनकी परीक्षा लेने के लिए उत्तराखंड प्राविधिक शिक्षा परिषद रुरकी में कार्यरत एक

आप भी देखिये नियुक्ति घोटाला ख़ास रिपोर्ट

हरिद्वार के जिला पंचायत मे कार्यालय की नियुक्ति मे फर्जीवाड़े का खुलासा आर.टी.आई. मे प्राप्त सूचनाओ से हुआ जिसमें सभी नियमों को दरकिनार करते हुऐ अवैध तरीके से समूह ग के आशुलिपिक पद पर नियुक्ति कर दी गई
शुरु से लेकर आखिर तक इस भर्ती प्रक्रिया में नियमो को ऐसे तोड मरोड कर पेश किया गया है कि पूरे मामले से भ्रष्टाचार की बू आती है संविदाकर्मी के रूप मे भर्ती करवाने से लेकर आशुलिपिक पद स्थाई नियुक्ति होने तक विभाग के शीर्ष अधिकारी गोपाल सिंह पर पूरी तरह से मेहरबान दिखाई दिये वर्ष 2010 में विभाग जब गोपाल सिंह का कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर नियुक्त किया गया तब इनकी भर्ती प्रक्रिया के दौरान अन्य ऐसे 3 लोगों द्वारा परीक्षा देना दिखाया गया जो कहीं ना कहीं गोपाल सिंह से नजदीकी संबंध रखते हैं तथा इंहीं की जाति से संबंधित है यानी जिला पंचायत में कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर नियुक्ति की सूचना केवल गोपाल सिंह तथा उसके नजदीकी रिश्तेदारों को ही पता चली और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार गोपाल सिंह को 4 जुलाई 2010 को विभाग में 1 वर्ष के लिए कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर तैनात किया गया उसके बाद तो विभागीय अधिकारियों ने विशेष सिफारिश कर साल दर साल उसका कार्यकाल भी बढवाया

जिसके लिए हर वर्ष अलग से प्रस्ताव दिलाया गया ताकि गोपाल सिंह को विभाग में नियमित रखा जा सके समय समय पर अन्य विभागो के लिए जारी शासनादेशो का हवाला देकर उसकी वेतन वृद्धि भी की गई

भ्रष्टाचार की सीमाएं तो तब तोड़ दी गई जब वर्ष 2015 में सभी नियमों के विरुद्ध जाकर गोपाल सिंह को आशु लिपिक पद पर स्थाई नियुक्ति की गई जिसके लिए ना तो शासन से अनुमति ली गई और ना ही बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव पास कर आ गया जिला पंचायत में लागू उत्तर प्रदेश जिला पंचायत अधिनियम 1961 के अनुसार ऐसा कोई प्रस्ताव बोर्ड की बैठक में पास करना अनिवार्य है तथा शासन से अनुमति लेना भी अनिवार्य है जो कि इस भर्ती प्रक्रिया में अमल में नहीं लाया गया आश्चर्य की बात तो यह है कि गोपाल सिंह के पास आशुलिपिक का ना तो कोई प्रमाण पत्र है और ना ही उंहें आशुलिपि आती है आसपास मौजूद लोगों का भी यह कहना है कि उन्होंने कभी आशुलिपि लिखी ही नहीं इस मामले में भी विभाग ने नियम विरुद्ध जाकर परीक्षा कराई दरअसल उनकी परीक्षा लेने के लिए उत्तराखंड प्राविधिक शिक्षा परिषद रुरकी में कार्यरत एक

सहायक आशुलिपिक को बुलाया गया आश्चर्य की सभी सीमाएं तो तब पार हो गई जब परीक्षा लेने के लिए जिला पंचायत कार्यालय द्वारा परिषद के निदेशक या विभागाध्यक्ष को नहीं बल्कि सीधे उसे सहायक आशुलिपिक को यू. डी .भट्ट को लिखित परीक्षा लेने के लिए आग्रह किया गया तब यह भी सोचने वाली बात है कि जिला पंचायत कार्यालय को कैसे पता चला कि यू. डी. भट्ट नाम का कोई आशुलिपिक प्राविधिक शिक्षा परिषद ,रूडकी में कार्यरत है और वह हमारा अनुरोध स्वीकार कर यहां परीक्षा लेने के लिए नियत समय में पहुंच जाएगा अब इसमें भी संशय है कि यू. डी. भट्ट विभागीय नियमों से परीक्षा लेने के लिए आए थे अथवा नहीं जब वह परीक्षा लेने आए तो उन्होंने अपने विभाग को सूचित किया या नहीं या विभाग ने उन्हें अनुमति दी या नहीं यह सारे ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जल्दी पता चलेगा

विनियमितीकरण नियमावली 2013 को आधार बनाकर गोपाल सिंह को आशुलिपिक पद पर स्थाई नियुक्ति देने का विभाग का तर्क भी पूरी तरह निराधार है क्योंकि यह नियमावली जब लागू की गई तो उसमें साफ तौर पर अंकित था की इस नियमावली के लागू होने की तिथिे को किसी दैनिक वेतन भोगी या संविदाकर्मी ने उस पद 5 वर्ष अपनी सेवाऐ दी हो जिस पर यह नियुक्ति होनी है इस नियमावली मे यह भी साफ तौर पर अंकिक था कि केवल उसी पद या समकक्छ पर स्थाई नियुक्ति होनी चाहिए जिस पर संविदाकर्मी सेवाऐ दे रहा हो

सहायक आशुलिपिक को बुलाया गया आश्चर्य की सभी सीमाएं तो तब पार हो गई जब परीक्षा लेने के लिए जिला पंचायत कार्यालय द्वारा परिषद के निदेशक या विभागाध्यक्ष को नहीं बल्कि सीधे उसे सहायक आशुलिपिक को यू. डी .भट्ट को लिखित परीक्षा लेने के लिए आग्रह किया गया तब यह भी सोचने वाली बात है कि जिला पंचायत कार्यालय को कैसे पता चला कि यू. डी. भट्ट नाम का कोई आशुलिपिक प्राविधिक शिक्षा परिषद ,रूडकी में कार्यरत है और वह हमारा अनुरोध स्वीकार कर यहां परीक्षा लेने के लिए नियत समय में पहुंच जाएगा अब इसमें भी संशय है कि यू. डी. भट्ट विभागीय नियमों से परीक्षा लेने के लिए आए थे अथवा नहीं जब वह परीक्षा लेने आए तो उन्होंने अपने विभाग को सूचित किया या नहीं या विभाग ने उन्हें अनुमति दी या नहीं यह सारे ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जल्दी पता चलेगा

विनियमितीकरण नियमावली 2013 को आधार बनाकर गोपाल सिंह को आशुलिपिक पद पर स्थाई नियुक्ति देने का विभाग का तर्क भी पूरी तरह निराधार है क्योंकि यह नियमावली जब लागू की गई तो उसमें साफ तौर पर अंकित था की इस नियमावली के लागू होने की तिथिे को किसी दैनिक वेतन भोगी या संविदाकर्मी ने उस पद 5 वर्ष अपनी सेवाऐ दी हो जिस पर यह नियुक्ति होनी है इस नियमावली मे यह भी साफ तौर पर अंकिक था कि केवल उसी पद या समकक्छ पर स्थाई नियुक्ति होनी चाहिए जिस पर संविदाकर्मी सेवाऐ दे रहा हो

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