क्या पलायन रोकने की यह पहल कारगर सिद्ध होगी ?

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बीते दो तीन दशकों के दौरान हमारी अकर्मण्यता के नतीज़तन बंजर बियावान मेँ तब्दील हो चुकी इस धरती को अन्न से सरसब्ज़ करने के लिए हाथ पर हाथ धरे, सरकार के भरोसे बैठने का वक़्त न रहा, इसी हक़ीक़त को महसूस कर पलायन से सर्वाधिक त्रस्त पौड़ी जनपद के सर्वाधिक पलायन पीड़ित कल्जीखाल विख के कुछ जागरूक भूस्वामियों ने एक कदम बढ़ाया है, जो भविष्य मेँ एक हसीन इबादत लिखेगा, सलग्न चित्र संख्या 1,2 और 5 ग्राम मिरचोडा निवासी व् पलायन एक चिंतन अभियान के संयोजक श्री रतन सिंह असवाल की पहल की तस्दीक़ करते हैं, श्री असवाल ने बैलों की जोड़ी पाल कर वर्षों तक बंजर पड़े खेतों को आबाद करने का बीड़ा उठाया, देखा देखी गांव के अन्य काश्तकार भी उनकी राह चल पड़े हैं। चित्र संख्या 3 घंडियाल गांव मेँ सेनि0 डाकपाल श्री धीरेन्द्र रावत द्वारा आधुनिक संसाधनों से मिटटी से जुड़ने के जज़्बे को दर्शाता है, चित्र संख्या 4 कांसखेत के निकट बांजखाल का है, जहाँ युवा श्री नितिन पटवाल ने करीब 4 दशक से बंजर पड़े खेतों को जेसीबी से खुदवाकर करीब 3 हैक्टेयर पर दलहनी फसलों की बुवाई कर जोखिम उठाया है, इसी विख के साकनी बड़ी गांव के वाणिज्य परास्नातक युवा श्री सुभाष रावत ने भी करीब 6 हेक्टेयर भूमि को सरसब्ज़ कर दिया है। इन सभी भूस्वामियों का कहना है कि यदि सरकार मनरेगा जैसी योजनाओं को सीधे कृषि से जोड़ दे तो वह इलाके की तस्वीर बदल सकते हैं। बहरहाल इन काश्तकारों के प्रयासों को सलूट, और उम्मीद है यह पहल अनुकरणीय होगी।

वरिष्ठ पत्रकार- अजय रावत

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