उत्तराखंड में लोकनृत्य की छटा

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उत्तराखंड की लोकसंस्कृति अनूठी है । समय बदला मगर लोगों ने अपनी परंपरा संस्कृति कला को अपनाए रखा है। कोई पर्व, आयोजन उत्सव हो यहां पारंपरिक परिधानों में, आभूषणों को पहने महिलाएं कहीं भी नृत्य करती हैं तो समा बंध जाता है। प्रकृति का भी अपना साथ मिलता है।[ads1]
कुमाऊं क्षेत्र में झौड़ा, बासंती ,थड्या, चौफला जैसे नृत्य उल्लास बिखेरते है । घागरी, आंगडी पिछौड़ जैैसे परिधानों मे स्त्रियां और धोती पाजामा सुराव मिरजै टांक जैस परिधानों के साथ पुरुष। नृत्य के अनुरूप हर परिधान। महिलाओं के गले का गुलबंद , चरयो, नाक की नथुली , कान की मुर्खली, हाथ की पौंछी और पांव के झंवर। पूरी तरह सजे धजे माहौल में नृत्य गीतों की सुंदर छटा। फिर चाहे वह घर का आंगन हो या कोई सांस्कृतिक संध्या या नृत्य गीतों की प्रतियोगिता। वहां कुछ क्षण मन रम जाता है।[ads1]

बेशक हर पारंपरिक साज नही दिखता मगर हुडके की गमक थाप सुनाई देती है पिछले दिनों हल्दवानी मे पुनर्वा महिला समिति के आयोजन में कल्याणी महिला समिति का नवरंग में नृत्य कौशल भाया था , परंपरा का निर्वाह करते उनके परिधान उत्सव आयोजन की गरिमा को बढ़ा रहे थे। सभी कला मंचों की प्रस्तुति अनूठी थी। एक छोटे से अंतराल में कुछ एक नृत्य देखने को मिले।[ads1]

और वह देखते ही बने। अपनी संस्कृति परंपरा से अभिभूत यहाँ की संस्कृति में भी लोकमंगल की भावना है। शायद इसीलिए मांगल की अनूठी शैली भी है। जो शुभ के लिए कला मंच के प्रथम प्रस्तुति के रूप में होती है। शुभ है मांगल्य मांगल का गायन फिर लौट रहा है

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