तकनीकी युग में भी पुस्तकालयों में उमड़ रहे पुस्‍तक प्रेमी, पढ़ने का शौक किताबों और ई-बुक्स के बीच बंट गया है

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देहरादून: कहते हैं जीवन की सबसे अच्छी दोस्त पुस्तकें होती हैं, जो हमेशा व्यक्ति का मार्गदर्शन करती हैं। लेकिन, ज्ञान से भरी इन पुस्तकों को आज सोशल मीडिया का कीड़ा चट कर रहा है। आलम यह है कि अब किताबें रैक में अलसायी सी दिखती हैं और किताब थामने वाले हाथों में हाई-फाई मोबाइल नजर आते हैं। हालांकि, इस बदलते माहौल में भी अभी एक बड़ा वर्ग पढ़ने में रुचि रखता है। तकनीकी युग में यह एक सुखद अहसास ही है कि पुस्तकालयों में भीड़ दिखाई पड़ रही है।[ads1][ads1]

किसी भी समाज के बौद्धिक विकास में स्थानीय शैक्षिक संस्थानों और उनके पुस्तकालयी योगदान को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि किताबें न सिर्फ संवेदनाओं और वैचारिक शक्ति को धार देती हैं, बल्कि व्यक्ति की सोच एवं कल्पनाओं को पंख भी। उनके व्यक्तित्व को सुदृढ़ बना यह उसे विस्तार देती हैं। आज स्मार्ट फोन और विभिन्न गजेट्स के दौर में किताबों का प्रयोग बेशक कम हुआ है, लेकिन न पुस्तकालय अप्रासंगिक हुए और न किताबें ही।

हजारों की संख्या में किताबें न सिर्फ हर साल छप रही हैं, बल्कि पाठकों के हाथों में भी पहुंच रही हैं। इस दौर में कई पुस्तकालय भी हैं जो किताबों का समाज से कनेक्शन मजबूत कर रहे हैं। ऐसा ही एक नाम है दून लाइब्रेरी एवं रिसर्च सेंटर। शहर के बीच परेड मैदान में स्थित दून लाइब्रेरी ज्ञान-मीमांसा एवं ज्ञान-सृजन की रफ्तार को मंद नहीं पड़ने दे रही। न सिर्फ साहित्य प्रेमियों, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी यह पसंदीदा स्पॉट है।[ads1][ads1]

आप पढ़ने के शौकीन हैं तो किताबों का एक अद्भुत संसार यहां आपके खैरमकदम को तैयार है। पुस्तकालय की बढ़ती लोकप्रियता ही है कि इसके सदस्यों की संख्या तीन हजार का आंकड़ा पार पहुंच चुकी है। एक रिपोर्ट के अनुसार हर माह करीब 800 लोग नियमित यहां से किताबें पढ़ने ले जाते हैं। खास बात यह कि पुस्तकालय के पुस्तक संग्रह में निरंतर नई किताबें जुड़ती जा रही हैं। किताबों में खोये युवा यहां सामान्यत: मिल जाएंगे। यहां वार्ता, परिचर्चा, फिल्म स्क्रीनिंग, प्रदर्शनी, शोध प्रकाशन आदि गतिविधियां भी निरंतर होती हैं। जिनसे बड़ी तादाद में लोग जुड़ते हैं। इतना ही नहीं दून लाइब्रेरी अब डिजिटल क्रांति के साथ भी कदमताल कर रही है।

किताबों व ई-बुक्स में बंटे पाठक
युवा पीढ़ी पढ़ने से कुछ हद तक विमुख जरूर हुई है, लेकिन स्थिति इतनी भी बुरी नहीं। बुक स्टॉल पर नजर दौड़ाएंगे तो पता चलेगा कि विगत वर्षों में न सिर्फ लेखक बढ़े, बल्कि अब कई ज्यादा किताबें भी प्रकाशित हो रही हैं। जिन्हें कद्रदान भी मिल रहे हैं और खरीदार भी। जाहिर है कि बिजनेस बढ़ा है। इतना जरूर है कि पढऩे का शौक किताबों और ई-बुक्स के बीच बंट गया है।

एक अध्ययन के अनुसार करीब 42 प्रतिशत युवा साहित्य पढ़ना चाहता है, जबकि 24 प्रतिशत गैर कथा साहित्य। कथा साहित्य में ज्यादातर युवा फंतासी, कॉमिक्स और क्लासिक्स पढ़ते हैं। लेकिन, रूमानी साहित्य में उनकी दिलचस्पी कम है। गैर कथा साहित्य में वे ज्यादातर धार्मिक पुस्तकें, जीवनियां व आत्मकथाएं पढ़ते हैं। भावी पीढ़ी में किताबों का क्रेज जगाने के लिए इस बिजनेस से जुड़े लोग भी अब तमाम तरह के प्रयास करे रहे हैं। जिसमें लिटरेचर फेस्टिवल से लेकर उन्हें लेखक से रूबरू कराने जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

पढ़ने का माहौल अभी नहीं हुआ खत्म  
दून लाइब्रेरी व रिसर्च सेंटर के निदेशक डॉ. बीके जोशी का कहना है कि पढ़ने का माहौल अभी खत्म नहीं हुआ है। हमारे यहां ही सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यदि कोई किसी खास किताब की फरमाइश करता है तो उसके लिए भी व्यवस्था की गई है।[ads1][ads1]

पढ़ने का शौक किताबों और ई-बुक्स के बीच बंट गया है
बुक वल्र्ड के संचालक रणधीर अरोड़ा का  कहना है कि पढ़ने का शौक किताबों और ई-बुक्स के बीच बंट गया है। युवा कुछ हद तक पढ़ने से विमुख हुए हैं, लेकिन ओवरऑल देखा जाए को किताबों का क्रेज अब भी कम नहीं हुआ। आमजन में रुचि पैदा करने के लिए लिचरेटर फेस्टिवल आदि आयोजित किए जा रहे हैं। –

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