उत्तराखंड: तटबंध टूटने गांवो में आयी बाढ़, तबाही को देख ग्रामीण दहसत में

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  • पिछले वर्ष सिंचाई विभाग की ओर से  कांगड़ी गांव को बाढ़ से बचाने के लिए तटबंध  बनाए थे,  लेकिन वे बरसात के पानी को नहीं झेल सके.
  • सिंचाई विभाग के अधिकारियों की लापरवाही लोगों पर भारी पड़ रही है.

लगातार हो रही भारी बारिश के कारण हरिद्वार के कई गांव में तटबंध टूट गए. ज‌िसके कारण नद‌ियों का सारा पानी गांव में घुस गया। पानी ने जो तबाही मचाई उसे देख ग्रामीण भी दहशत में आ गए.

सिंचाई विभाग के अधिकारियों की लापरवाही लोगों पर भारी पड़ रही है। सिंचाई विभाग ने इस वर्ष भी तीस लाख रुपये खर्च कर कांगड़ी गांव में तटबंध बनाए थे, लेकिन वे पानी में बह गए। इसका कारण वायरक्रेट गुणवत्ता सही नहीं होना बताया जा रहा है। वर्ष 2013 में आई आपदा से श्यामपुर कांगड़ी गांव के पास काफी भूकटाव हो गया था, तब से हर साल गंगा का पानी गांव की जमीन को लील रहा है। गंगा से सटे होने के कारण कांगड़ी गांव बाढ़ के मामले में क्षेत्र का सबसे संवेदनशील माना जाता है।

पिछले वर्ष सिंचाई विभाग की ओर से  कांगड़ी गांव को बाढ़ से बचाने के लिए तटबंध  बनाए थे,  लेकिन वे बरसात के पानी को नहीं झेल सके। गांव के पास पिछले साल भी तीस लाख की लागत से वायरक्रेट तेज बहाव में बह गए। इस वर्ष पहाड़ों मे तेज बरसात से  ज्यादा पानी आने पर लाखों के तटबंध पानी में बह गए हैं । जिससे गांव को खतरा पैदा हो गया है। 

चंडीघाट से चिड़ियापुर यूपी के बॉर्डर तक हरिद्वार- नजीबाबाद राजमार्ग जगह-जगह गड्ढों में तब्दील हो गया है। ऐसे में  हर रोज यहां सड़क दुर्घटना होती रहती है।  हरिद्वार- नजीबाबाद मार्ग पर चंडीघाट पुल से कांगडी , गाजीवाली, श्यामपुर ,सजनपुरपीली, गैंडी खाता, चिड़ियापुर चेकपोस्ट तक बारिश के कारण गहरे गड्ढे  हो गए हैं। जिसमें बरसाती पानल्ी गड्ढों में भरा होने से वाहन चालकों को गड्ढों  का अंदाजा नहीं हो पाता  है और ऐसे में आए दिन सड़क दुर्घटना होती रहती है।

पुरानी कुंडी के सामने गंगा में पानी बढ़ने पर काफी भूमि गंगा में समा चुकी है। ग्रामीण अधिकारियों से लंबे समय से यहां तटबंध निर्माण की मांग करते चले आ रहे है। इसके बावजूद कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से तटबंध का निर्माण कराने की मांग की है। ग्राम प्रधान सविता देवी का कहना है कि कटाव से खेती की भूमि कम होती जा रही है। सैकड़ों बीघा भूमि गंगा में समा चुकी है, जिससे कई परिवार भूखमरी के कगार पर पहुंच गए है।

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