भीड़तंत्र– हिंसक होते लोग:जिसकी लाठी उसकी भैंस

0

(नोएडा की महागुन सोसायटी में हुई घटना हमारे समाज की एक ऐसी तस्वीर दर्शाती है, जिससे पता चलता है कि हम सब में बर्दाश्त करने की क्षमता ख़त्म होती जा रही है ये घटना इस बात पर भी प्रकाश डालती है कि शोषित और वंचित वर्ग के साथ अत्याचार और भीड़तंत्र हमारे देश में धीरे-धीरे स्थापित हो रहा है।)

पिछले दिनों जो घटना महागुन सोसायटी में हुई उसे लेकर FIR दोनों तरफ से हो चुकी है और अब यह मामला जांच के दायरे में है। इस घटना से जहां सेठी परिवार अभी भी तनाव की स्थिति है, वहीं दूसरी तरफ ज़ोहरा बीबी और उनके पति लापता हैं। पुलिस उनकी तलाश कर रही है। इस घटना और उसके बाद हुए पूरे घटनाक्रम पर हमने घरेलू कामगारों से बात की और जो पाया उससे जुड़े विचार यहां रख रहे हैं।

डिवाइड एंड रूल

बांटो और राज करो, ये एक पुराना आज़माया हुआ नुस्खा है जिसकी झलक हमे यहां हुई कार्रवाई में भी दिखती है। पहले से बंटे हुए लोगों को ये याद दिलाना शायद बहुत ही आसान होगा कि वो बटें हुए हैं। बस उन्हें याद दिलाना है कि वो किस तरह (जाति, धर्म, रंग, भाषा, काम या आर्थिक रूप से) एक दूसरे से अलग हैं और आपका काम हो गया। अगर आपका तबका हाशिये पर है तो तोड़ने की प्रक्रिया और आसान हो जाती है। नोएडा की घटना के बाद जिस प्रकार सरकारी बुलडोज़र फल और सब्जी बेचने वालों की दुकानों पर चला, वो दिखाता है कि किस प्रकार गरीब तबके को तोड़ा जा सकता है।

जब रोज़ी-रोटी पर आंच आती है तो सही गलत का ज्ञान भी बेईमानी लगता है और आवाज़ दब जाती है। दूसरी तरफ महागुन सोसायटी में 80-100 घरेलू कामगारों के प्रवेश पर रोक लग गई। जिस सोसायटी में 350 महिलाएं काम कर रही थी, वहां 100 महिलाओं पर रोक लगा दी गई और जिनको प्रवेश मिला भी उनमें से कुछ को उनके मालिकों ने काम पर नहीं आने दिया। मालिकों का कहना है कि वो अभी कुछ दिन खुद से काम करना चाहते हैं और बाद में अगर ज़रूरत हुई तो घरेलू कामगारों को काम पर बुलाएंगे। इस एक घटना से बहुत से लोगों की रोज़ी-रोटी छिन गई और इस तरह जैसे एक सप्ताह पूर्व घटनास्थल पर कामगारों की एक बड़ी भीड़ इकठ्ठा हुई थी, वो आगे शायद कभी साथ ना नज़र आए।

जिसकी लाठी उसकी भैंस:

जब आपके पास प्रशासन की शक्ति हो तो प्रवासी मज़दूर आपका क्या बिगाड़ सकते हैं। प्रवासी होने से राज्य सरकारों के लिए तो आप अदृश्य हो ही जाते हैं, उस पर अगर शंका आपके बांग्लादेशी होने पर है तो आप किसी भी सरकार के लिए शायद मायने नहीं रखते। मज़दूर वर्ग के संगठन का टूटना भी एक संकेत दे रहा है कि हमारा उच्च और मध्यम वर्ग अब मज़दूर वर्ग की बातें सुनने को तैयार नहीं है। हमारी ये संवादहीनता एक टकराव की ओर हमें ले जा रही है, जिससे मज़दूर एवं मालिक के बीच मानवीय और भावनात्मक जुड़ाव ख़त्म हो रहा है।

भीड़तंत्र– हिंसक होते लोग:

पिछले कुछ समय में हमें यह एहसास हुआ है कि भारत की जनता का विश्वास भीड़तंत्र में बढ़ता जा रहा है। 500 लोगों की भीड़ का आपकी गली या सोसायटी में घुस आना जिनके हाथ में पत्थर और लाठिया हैं, सोचने में ही यह दृश्य भयावह लगता है। लोग अपने बर्दाश्त करने की क्षमता खोते जा रहे हैं और उन्हें मानवता या कानून की कोई फिक्र नहीं है। जब ऐसा कुछ होता है तो क्या लोग इतनी उतेजना या गुस्से से भरे होते है कि उनकी सोचने और समझने की शक्ति खत्म हो जाती है? ऐसा नहीं है, उस दिन जो लोग आए उनमें से कई लोगों ने अपना मुंह ढका हुआ था। वो नुकसान पहुंचाना चाहते थे, पर आयोजित तरीके से।

कहा जाता है की भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती और इसका फायदा लोग उठाना सीख गए हैं। प्रशासन ऐसे मुद्दों में कई बार फेल हो चुका है पर इस घटना में ऐसा नहीं हुआ। घटना के तुरंत बाद प्रशासन हरकत में आया और इसमें गिरफ्तारियां भी हुई। ये उदाहरण है प्रशासनिक इच्छा शक्ति का। लोग हिंसक हो रहे हैं और आयोजित ढंग से भीड़ का फायदा उठाना चाहते हैं। अगर जल्द ही सरकार ने इस पर काम ना किया तो लोकतंत्र पर ये एक बड़ा आघात होगा जो हमारी जड़ो को हिला देगा।

अत्याचार की परिभाषा:

इस घटना ने अत्याचार को भी परिभाषित किया है। जैसा कि खबरों के हवाले से पता चलता है, ज़ोहरा बीबी के मुताबिक उनके साथ मार-पीट हुई, उनका फोन छीना गया और उन्हें एक कमरे में कई घंटो तक बंद रखा गया। अगर ऐसा हुआ है तो ये घटना अमानवीयता ही कही जाएगी। इस घटना ने एक ऐसे सत्य को उजागर किया है, जिससे पता चलता है कि हम घरेलू कामगारों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करते हैं और उनकी स्थिति क्या है।

इसी घटना से उठे सवालों पर केन्द्रित एक चर्चा का आयोजन मार्था फैरेल फाउंडेशन और प्रिया संस्था द्वारा किया गया जो कि घरेलू कामगार महिलाओ के साथ दिल्ली, फरीदाबाद, और गुरुग्राम में काम कर रही है। इस चर्चा का मकसद था ऐसी घटना की मानसिकता को समझना। ये एक बड़ी घटना थी हमारे लिए, पर आश्चर्यजनक बात ये थी कि घरेलू कामगारों को ये घटना सामान्य लगी। ऐसा तो रोज़ होता रहता है, मार-पीट होने पर काम छोड़ देते हैं पर इसकी शिकायत किसी से नहीं कर सकते क्यूंकि इसकी कहीं भी सुनवाई नहीं है।

“पुलिस का साथ भी हमें नहीं मिलता, हमें बाहर का बोल कर हमसे ही पैसे निकलवा लिए जाते है” इस तरह की बातें घरेलू कामगारों से सुनना बहुत आम है। पैसों के अलावा लैपटॉप और मोबाइल के नाम पर भी इल्ज़ाम लगाए जाते हैं। शारीरिक दंड देना, मौखिक, गैर-मौखिक, यौन उत्पीड़न- हर तरह से कानून के खिलाफ है। फरीदाबाद में हुई मीटिंग में हमें एक महिला ने बताया कि जिस बिल्डिंग में वो काम करती है वहीं एक घरेलू कामगार महिला पर इसी तरह का इल्ज़ाम लगा और उसे तुरंत घर की मालकिन ने मारना शुरू कर दिया। मार-पीट के बीच जब लोगों ने बचाव किया तब मामला कुछ ठंडा हुआ। बाद में पता चला कि जिस पर्स की चोरी पर इतना हंगामा हो गया वो मैडम की गाड़ी में पड़ा था।

बात सही और गलत की नहीं है पर अगर चार लोग आपके साथ भी खड़े हो तो आपको शक्ति मिलती है अपनी बात रखने की या कोई आपको मारेगा तो नहीं। घरेलू कामगार महिलाओं के पास तो उन चार लोगो का संगठन भी नहीं है। एक बात जो दोनों ही समूहों ने कही, वो ये थी कि कामगार महिलाएं सुरक्षित महसूस नहीं करती और गरीब, अशिक्षित और प्रवासी होने के कारण उनकी कोई सुनवाई भी नहीं है। इसमें एक और बात जोड़नी यहां बहुत ज़रूरी है कि चर्चा में मौजूद सभी प्रतिभागियों ने ये माना कि सब लोग एक जैसे नहीं होते। जिन घरों में वो काम करती हैं, वहां ऐसे भी लोग हैं जो अच्छा बर्ताव करते हैं और उन्हें अपने परिवार की तरह रखते हैं।

हमे ये भी जानकारी मिली कि धर्म, जाति और भाषा के आधार पर भी भेदभाव होता है। इस वजह से इन्हें नाम बदलकर भी काम करना पड़ता है। जो महिला आपके घर की सफाई करती है, उसे गंदा समझा जाता है, उसे घर का शौचालय इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होती। उन्हें गार्ड के लिए बने शौचालय इस्तेमाल करने को कहा जाता है।

कुछ लोग महीने में एक भी छुट्टी नहीं लेने देते और छुट्टी लेने की स्थिति में पैसे काटते हैं। अपना पैसा तय करने का अधिकार भी उन्हें नहीं है। जो घरेलू कामगार 24 घंटे के समय में काम करती हैं, उन्हें खाने को ठीक से नहीं देते, उन्हें घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं है और उन पर गार्ड नज़र रखते हैं। ये सभी अनुभव पढ़े लिखे लोगों के साथ के हैं। ये बातें सुनकर समझना मुश्किल है कि हमारा समाज समय के साथ आगे बढ़ रहा है या संवेदना के स्तर पर और पीछे लुढ़कता जा रहा है। इन सभी बातों में जातीय व्यवस्था का प्रतिबिम्ब नज़र आता है।

करीब पिछले 6 दशकों से घरेलू कामगार अपने अधिकारों और अपने कामगार होने के दर्जे के इंतज़ार में हैं। 1959 में पहली बार घरेलू कामगारों के लिए एक कानून पर चर्चा हुई थी, जो बिल कभी सदन की चर्चा में भी शायद नहीं आया। उसके बाद कई बार कोशिशें हुई पर बात नहीं बनी। पिछली बार सरकार के समक्ष महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने साल 2011 ने बिल रखा था, लेकिन उस पर भी सहमति नहीं बनी। मज़दूर और किसान के मुद्दे पर कोई बात नहीं करना चाहता। पूंजीवाद और उदारीकरण के साये में हम इन अदृश्य कामगारों को भूल गए हैं जो शहरों को चलाते तो हैं पर इन शहरों का हिस्सा नहीं बन पाए हैं।

Loading...