देहरादून एक लड़की के हाथ में इस प्रकार का जादू, जिसको देखने देश विदेशों से उमड़ रहा है जनसैलाब

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देहरादून: उत्तराखंड की एक 26 साल की लड़की के हाथों का हुनर देखने को देश के अलग – अलग राज्यों से युवा देहरादून आ रहे हैं। रोज वहां बहुत से लोग दिखते हैं। और वो लड़की कभी नाली साफ करते हुए तो कभी भूसे के ढ़ेर पर कूदते दिखती है। उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि वह सौम्या फूड प्राइवेट लिमिटेड की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। उसका कहना है कि पहले अपने काम स्वयं करो फिर किसी को सीखने की सलाह दो। इस लड़की के हुनर ने ना सिर्फ इसे एक सफल कारोबारी बनाया बल्कि उत्तराखंड से लेकर राजस्थान तक के युवाओं को रोजगार भी दिलाया।
जहां कॉलेज के बाद युवा एक अच्छी जॉब की तलाश में इधर – उधर भटकते रहते हैं, उस उम्र में इस लड़की ने लाखों का पैकेज छोड़कर खेती करने की सोची। जी हां हम बात कर रहे हैं मशरुम गर्ल के नाम से प्रसिद्ध दिव्या रावत की। जिस उम्र में युवा एक अच्छे पैकेज की नौकरी के लिए अथक प्रयासों में लगे रहते हैं, उस उम्र में उत्तराखंड की मशरूम गर्ल ने दिल्ली में लाखों का पैकेज छोड़कर वापस आई और मशरूम की खेती शुरू की। मशरुम उत्पादन में महारत हासिल कर दिव्या ने 35 से 40 डिग्री में मशरुम उगाकर इस क्षेत्र में रोजगार की नई संभावनाओं को जन्म दिया। आम धारणा यही है कि मशरूम 20 से 22 डिग्री के तापमान पर उगाया जाता है लेकिन दिव्या ने मशरूम उगाने की प्रक्रिया को न सिर्फ सरल बनाया बल्कि उसे आम किसानों के लिए सस्ता भी बना दिया है।
इससे भी ज्यादा दिव्या ने हिमालय की दुलर्भ जड़ी – बूटी कीडाजड़ी को अपने लैब में उगाकर सबको चौंका दिया। उत्तराखंड के सुदूर जनपद चमोली की रहने वाली दिव्या की स्कूलिंग देहरादून के आर्मी स्कूल से हुई। उसके बाद एएमआईटीवाई विश्वविद्यालय से बीएचडब्ल्यू में उच्च शिक्षा के बाद इग्नू से सोशल वर्क में मास्टर डिग्री हासिल की। पढ़ाई में होशियार होने के कारण दिव्या को जल्द अच्छी नौकरी भी मिल गई लेकिन जब दिव्या ने देखा कि 5- 10 हजार की नौकरी के लिए युवा पहाड़ को छोड़कर दिल्ली जैसे शहरों में पलायन करने को मजबूर हैं तो उन्होंने नौकरी छोड़कर वापस घर लौटने का मन मनाया और उत्तराखंड में रोजगार के साधन तलाशने लगी। काफी रिसर्च करने के बाद उन्हें लगा कि मशरूम की खेती से वो न सिर्फ अपना कारोबार खड़ा कर सकती है बल्कि अन्य लोगों को रोजगार दिला सकती है। इसके लिए उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ हर्टिकल्चर, डिफेन्स कॉलोनी देहरादून से मशरूम उगाने का प्रशिक्षण लिया। 2012 में शुरू हुआ मशरूम गर्ल का ये सफर आज सौम्या फूड़ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रुप में खड़ा है
आज दिव्या रावत अपने तीन मंजिले घर पर खुद मशरूम का उत्पादन करती है। उनकी उत्तराखंड में 53 यूनिट हैं। हर यूनिट में 10 से 15 लोग काम करते हैं। दिव्या के पास उनकी खुद की लैब हैं, जहां हाल ही में उन्होंने हिमालय की दुलर्भ कीड़ाजड़ी भी उगाई हैं। यह देश की पहली लैब है जहां इस दुलर्भ ज़ड़ी –बूटी को उगाया गया है। सालभर में तीन तरह के मशरुम का करती है उत्पादन बकौल दिव्या उन्होंने मशरूम खेती को इसलिए अपनाया कि यह स्मार्ट फर्म के साथ – साथ पूरे साल भर की जाने वाली खेती है। दिव्या सालभर में तीन तरह का मशरूम उगाती हैं। जिनमें बटन मशरूम जो सर्दियों में उगाई जाती है और लगभग एक महीने में तैयार हो जाती हैं।
ओएस्टर मशरूम जिनका उत्पादन सामान्य मौसम के तापमान पर किया जाता है और इसे तैयार होने में 15 से 20 दिन लगते हैं। मिल्की मशरूम, इसका उत्पादन गर्मियों के सीजन में किया जाता है। इसे तैयार होने में 40 – 45 दिन लगते हैं। इस मशरूम को उगाने के लिए दिव्या रावत को नेशनल अवार्ड भी मिला है। क्योंकि अब तक की धारणा यह थी कि मशरूम 20 से 25 डिग्री के तापमान पर उगते हैं लेकिन मशरूम गर्ल ने मिल्की मशरूम को उगाकर न सिर्फ इस धारणा को बदला बल्कि आम किसानों के लिए भी गर्मियों में मशरूम उगाने का रास्ता दिखाया। दिव्या बताती है कि बाकी मशरूम को गर्मियों में उगाने के लिए एसी की जरुरत पड़ती है लेकिन मिल्की मशरुम गर्मी में भी उग जाता है। मशरूम उगाने की प्रक्रिया को बनाया सस्ता और सरल दिव्या बताती है किसान पहले मशरुम को उगाने के लिए फैक्ट्री के पैर्टन को अपनाता था। जिसमें की 4 से 5 करोड़ का इन्वेस्ट करना पड़ता है लेकिन दिव्या ने सबसे पहले फैक्ट्री पैर्टन को हटाया। इसके लिए उन्होंने नई – नई वैराइटी की मशरुम उगाई, जो ज्यादा तापमान में भी उग जाती है। इसके अलावा फैक्ट्री में लगाए जाने वाले महंगे रैंक की बजाय उन्होंने सस्ते रैंक लगावाए, साथ ही हैंकिग मैथर्ड को अपनाया। जिससे कि अब मशरुम उगाने के लिए सिर्फ 20 से 30 हजार तक का खर्चा आता है।
कीड़ाजड़ी उगाकर किया देश का हतप्रभ दिव्या रावत ने थाईलैंड जाकर हिमालय बुग्याल में पाई जाने वाली दुलर्भ कीड़ाजड़ी उगाने का प्रशिक्षण लिया और अपने लैब में इसे सफलतापूर्वक उगाया भी है। कीड़ाजड़ी का नाम कॉर्डिसेप्स साइनेसिस है और इसकी अंतराष्ट्रीय बाजार में लाखों की कीमत है। सामान्यतय इसे ट्रोपिंग मशरूम भी कहते हैं। यह पाउडर, शाक्तिवर्धक कैप्सूल, चाय बनाने के काम आती है। इसकी कीमत दो लाख रुपए प्रति किलो तक थोक मूल्य है। गौरतलब है कि देश में कीड़ाजड़ी के बारे में लोगों को तब पता चला जब उत्तराखंड के बुग्याली क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ा। जिसके बाद इस कीमती मशरूम की जानकारी मिली। हिमालय बुग्यालों में उत्पन्न होने वाली कीड़ाजडी का दोहन करना प्रतिबंधितत है क्योंकि इसका हिमालय पर प्रतिकूल असर पड़ता है लेकिन व्यावसयिक स्तर के लिए इसे लैब में उगाया जा सकता है। दिव्या संभवत भारत की पहली महिला है, जिसने लैब में कीड़ाजड़ी उगाई। युवाओं के साथ महिलाओं को दिया स्वरोजगार दिव्या ने मशरूम से न सिर्फ अपना कारोबार

 

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