वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावतजी की नई किताब टिहरी रियासत का एतिहासिक जन विद्रोह

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वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावतजी की नई किताब टिहरी रियासत का एतिहासिक जन विद्रोह कई मायने में महत्वपूर्ण कृति है। ऐसी कृतियां गहन शोध, इतिहास की परख और निरंतर चिंतन के बाद सामने आती हैं। उनकी यह कृति जहां दुनिया की चर्चित क्रांतियों में एक टिहरी रियासत की आजादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर हैं, वही बेहतर यह भी यह उस दौर के हमसे लगभग ओझल हुए एक बडे नायक परिपूर्णानंद पैन्यूली पर केंद्रित हैं। सच यही है कि उत्तराखंड का समाज आज तक अपने इस नायक का मूल्यांकन नहीं कर पाया।

बिल्कुल वैसे ही जैसे लोकगीत संगीत ,संस्कृति परंपरा की आभा और चर्चाओं के बाद भी उत्तराखंड का समाज स्व. केशव अनुरागी और जीत सिंह नेगी मुरलीधर जगूडी जैसे साधकों संस्कृतकर्मियों को उनका यथास्थान नहीं दे पाया।

टिहरी रिसायत में वह लडाई, जो अपने आप में एक गाथा है, उस पर पहले भी लिखा गया है। और अलग अलग परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है। कुछ पहलुओं पर सहमति होती है कुछ पर असमहति के स्वर भी होते हैं। निश्चित सात खंडों में लिखी जयसिंह की कृति – टिहरी रियासत का ऐतिहासिक जनविद्रोह पर कुछ पहलुओं पर असहमति हो सकती है। कहीं कुछ गलतफहमियां भी। लेकिन निरंतर अध्ययन और कठिन परिश्रम के बाद उस गाथा को एक पुस्तक का आकार देना बेहद सराहनीय कर्म है।
टिहरी रियासत में अपने हक़ और आवाज़ के लिए छिड़ी उस लडाई में तिलाडी कांड शूमार है जो जलियावाला बाग को दोहराता है। उस गाथा में कीर्तिनगर के शहीद हैं। और चौरासी दिन के आमरण अनशन पर बैठ कर, जेल की यातनाएं सह कर अपने जीवन का बलिदान करने वाले श्रीदेव सुमन हैं। यहां कहना होगा चाहे तिलाडी कांड हो , भारी बेडियां पहन कर स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का बिगुल फूंकने वाले जननायक श्रीदेव सुमन हों या कीर्तिनगर की घटना , इनका कहीं न कहीं जिक्र आता रहा। खासकर साहित्यकार स्व विद्यासागर नौटियालजी ने टिहरी के जन जीवन और इतिहास पर गौरवमय साहित्य सृजन किया। लेकिन अदभुत जीवट के सैैनानी, योद्धा और चिंतक परिपूर्णानंद पैन्यूली पर लगभग नगण्य चर्चा हुई। जबकि उनका व्यक्तित्व और कर्म थी किसी यशगाथा की तरह है। वह आजाद भारत में सांसद बनेे, लेकिन केवल यह उनका परिचय नहीं। इस आलोक में भी जयसिंह की इस किताब को पढना जरूरी और दिलचस्प हैं। यह किताब हमें कुछ विचलित भी करती है कि आखिर किन मूल्यों पर हमारे पुराने लोग खडे थे। उनके संघर्ष कितने सार्थक, कितने जमीनी थे। वो लोगों से किस तरह जुडे थे।
उन संस्कारों से आजकु हम कहां भटक गए। जातीय , क्षेत्र ऊंच -नीच की दिवारें खडी करके हमने समाज बांट दिया। फिर हम इतिहास के नायकों को किस तरह याद करें। ऐसे में किताब हम सबको झकझोरती है। एक बडे पन्नों की किताब को पढने में थोडी कशमकश हो सकती हैं कही कुछ ऐतराज भी होगा लेकिन इस बहाने हम पिछले दौर में देखने की कोशिश तो करते हैं। तब हम श्रीदेव सुमन जैसे बलिदानी और परिपूर्णानंद पैन्यूली जैसे कुछ और व्यक्तित्व नजर आते हैं। कुछ नए पुराने संदर्भ पता लगते हैं। कुछ पडताल होती है। हम विगत को महसूस करते हैं। राज्य बनाने का सपना यही तो था कि हम अपने क्षेत्र को जाने, अपने क्षेत्र को संवारे

जयसिंहजी सक्रिय पत्रकारिता में रहे हैं। अपनी खास शैली में मीडिया संस्थान बदलते रहे हैं। किसी एक जगह लंबे समय तक नहीं ठहरे। लेकिन बीच के उस पडाव में वह लेखन का कर्म करते रहे। वह इतिहासकार नहीं है लेकिन उनकी रचनाओं का आधार, ऐतिहासिक संदर्भ से ही लिए होते हैं। आजादी के दौर में पत्रकारिता पर भी उनकी एक अच्छी किताब प्रकाशित हुई। रंवाई जौनसार क्षेत्र में भी उनका निरंतर कर्म है। बिनसर प्रकाशन से आई टिहरी रियासत के आंदोलन पर आई इस किताब को पढा जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस कृति के विमोचन के अवसर पर कहा कि इतिहास को पढना बहुत जरूरी है। वास्तव में सबसे ज्यादा निराशा राजनेताओं से ही हुई है। जनप्रतिनिधियों ने पढना लिखना छोड दिया है। इस संवेदनशील और संघर्षशील राज्य में गिने चुने नेता हैं जो पढते लिखते हैं और समय समय पर किताबें भी खरीदते हैं। खासकर उस राज्य में जहां अकेले देहरादून में दो हजार पत्रकार हों जहां पत्र पत्रिकाओं को करोडों रुपए सरकारी विज्ञापन में जाते हैं , वहां कोई रचना कृति खरीदी क्यों नहीं जाती। सच ये हैं कि पत्रकार विश्वविद्यालयो शैक्षिक संस्थानों के प्रोफेसर, लेक्चरर भी बहुत कम किताबें खरीदते हैं। जय सिंह रावत जैसे लेखक मनीषी फिर भी निराश नहीं होेते और अथाह मेहनत से अपनी नई किसी नई रचना में लग जाते हैं। यही शुभ है यही किसी समाज को बचाने की सुंदर पहल है

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