उच्च हिमालयी जडी बूटियों को निकालने की विधि और समय….

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जोशीमठ: भाद्रपद की नन्दा अष्टमी आने वाली है. तिथि अनुसार 28 अथवा 29 अगस्त को नन्दा अष्टमी होगी हिमालय की आराध्या ” नन्दा देवी “ को लेकर भक्त उच्च हिमालयी बुग्यालों की ओर श्रद्धा, आस्था के साथ परम्परा के लिए निकले है । ” अष्टमी को हिमालय निर्धारित हिमालयी स्थानों से लेकर घर गांवों में नन्दा अष्टमी मनायी जाती है ।

अब बात करते हैं हिमालयी जडी और बूटियों की.  मेडिकल सांइस में ” आयुर्वेदिक जडी बूटियों का महत्व आदि काल से है । आज जब हिमालयी जडी बूटियों का ब्यापार हजारों करोड़ रुपये तक का है । हर कोई हिमालयी जडी बूटियों के नाम पर अपना प्रोडेक्ट बेच रहा है । संजीवनी बूटी से लेकर अनेक असाध्य रोगों की जडी बूटी के प्रति क्रेज बना हुआ है ।
” पर गौर करने वाला तथ्य यह है कि उच्च हिमालय शिखरो में प्रकृति वश उगती जडी बूटी जब चाहो तब निकालो और प्रयोग करो अथवा इसका अंधाधुंध विदोहन और मोटी कमाई के लिए दोहन करो. ऐसा न तो शास्त्रीय अनुमति है और ना ही वैज्ञानिक तथ्य ।
” उच्च हिमालयी जडी बूटियां केवल ” नन्दा अष्टमी ” के बाद ही खोज करने और विधि पूर्वक निकाने का प्रावधान है । इसका प्रकृतिक नियम यह है कि हिमालयी बुग्याल में भूमि के अन्दर इस अवधि में ही ” जडी अपनी औषधीय गुणवत्ता और परिपक्वता प्राप्त कर लेती है । 6 माह उगनू से लेकर मौसम आये विभिन्न परिवर्तनों से और जमीन के अन्दर उन्हीं के प्रभावो से अपने आप में औषधीय गुण प्राप्त करने के बाद प्रभाव के लिए तैयार होती है हिमालय जडी नन्दा अष्टमी के बाद ही गुणवत्ता प्राप्त करती है ह चाहे वह बुग्याली , फूल ” ब्रह्म कमल हो . फैन कमल हो . हो या अन्य फूल या अन्य शक्ल मे उगने वाली जड़ी बूटियां ।

हिमालय दुर्लभ जडी बूटी के नाम पर हजारों करोड़ का ब्यवसाय रहा है पर तर्क और तरीका यह है कि हिमालयी जडी बूटियो का एक सीमा से अधिक विदोहन या निकालने की न तो शास्त्रीय अनुमति है और न ही इसके प्रभाव होने की गांरन्टी । पुराने वैध्यों और जानकरों से बडी महत्वपूर्ण जानकारी हिमालयी जडी बूटीयों के निकालने के बारे में मिली । बताते हैं हिमालय जडी बूटीयों को निकालने का और उनके गुण धर्म का समय नन्दा अष्टमी के बाद ही है । नंगे पैर जाना होता है जडी बूटी निकालने के लिए बुग्यालों मे ।जडियों के शीर्ष भाग का ज्ञान होता है । शुद्धता का विशेष ध्यान रखना होता है । शाकाहार . स्नान . ध्यान के बाद जिस स्थान पर जिस स्थान पर जडी बूटी है या जडी बूटी है । उसे प्रणाम . नमस्कार . ध्यान करके जडी बूटी से अनुमति लेनी और ” निवेदन ” करना पडता हे कि जिस निमित्त मैं आपको आपकी अनुमति से निकाल रहा हूं वह शुभ हो गुण कारी हो प्रभाव कारी हो । एक ही स्थान पर खोद खोद कर निर्ममता से नहीं थोड़ी थोड़ी जगह और अलग अलग जगह से निकाली जाती है निश्चित मात्रा में ये जडी बूटियां । आज की तरह बोरियों में भर भर कर नहीं । और तस्करी या बडे ब्यापार की चाह या आयुर्वेद कार्पोरेट बन जाने के लिए नहीं ।
साथ ही हिमालय जडी बूटियों को निकालने से पूर्व बुग्यालों की ऐडी आछरी. वन देवता. वन देवियों की भी अनुमति लेनी होती है
हिमालयी जडी बूटियों को समय. विधि. परिपक्व ज्ञान. अनुभव और निश्चित मात्रा में निकाली जाय. उसका मूल्य कमाई के लिए धर्म मूलक मूल्य के लिए हो तो यह लाभ कारी होती है .

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