जाेशीमठ, “पाषाण युग”में जीने काे मजबूर डुमक-कलगाेठ गांव

0

जाेशीमठ विकासखँड के सबसे दूरस्त गांव डुमक कलगाेठ आजादी के सात दशक बाद आज भी विकास की बाट जाेहता हुआ मुख्य धारा से अलग थलग पडा हुआ है,जाेशीमठ तहसील मुख्यालय से उर्गम घाटी हाेकर १० किमी० की विकट चढाई पार कर बजीर देवता के इस खूबसूरत गांव डुमक पहुचा जाता है,यहांपर आवाजाही हेतु सड़क मार्ग की बात सिर्फ कल्पनाओं में ही कर सकते है,आज भी यहांपर न स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध है,और न सडक,न संचार,और[ads1][ads1] न बेहतर भविष्य की सीढी चढनें काे उच्च विद्दालय और अध्यापक,न ही यहां १२ माह की बिजली आपूर्ती,खाद्दान संकट अलग,१५ से २० किमी० प्रतिदिन विकट चढाई तर कर ग्रामीणाें काे आज भी पाखी,पीपलकाेटी,जाेशीमठ से अपनी पीठ पर राशन लादकर गांव तक पहुचना पडता है,डुमक गांव आज भी पशुपालन और कृषि की आजीविका पर चल रहा है, विकास की याेजनायें यहां तक पहुंचनें में हांपने लगती है, पैदल मार्ग आज भी जानलेवा बने हुये है,ताे गांव में आज भी बीमार मरीजाें बुजुर्गाे और प्रसव पीडा में कराहती बेटी बहुओं काे अस्पताल के अभाव में १४ किलाेमीटर तक कुर्सी पर ही स्टेचर बनाकर ढाेया जाता है बदकिस्मत से कई जानें दर्द में छटपटा रास्ते में ही दम ताेड़ देती है,प्रत्येक परिवार का दैनिक उपयाेग का सारा सामान यहांतक मकान बनानें के लिये निर्माण सामग्री तक जाेड़ना टेडी खीर साबित हाे जाती है,आज भी यहां का युवा बेहतर जीवन के सपनें ही देख रहा है, गांव में मूलभूत सुविधाओ का इस कदर अभाव है कि गांव आज भी पाषाण काल के लालटेंन युग में जीने काे मजबूर है, शीतकाल में अँधेरा हाेनें पर [ads1][ads1]ग्रामीणाें काे लालटेंन के साये में रीत गुजारनी पड़ती है,हालांकि कुछ परिवाराें के पास अपनी साैलर लाईटे भी है पीएम माेदी जी के डिजीटल इंडिया के सपनें काे ये गांव कब साकार कर पायेगा ये माेदी जी ही जानें लेकिन इतना जरूर है कि इस गांव में विकास की किरण आखिर कबतक पहुचेगी या काेंन विधायक काेंन एमपी यहां के लाेगाें की सुध लेगा,

Loading...