क्या उत्तराखंड की मीडिया के यही हाल हैं

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आप सोचते होंगे हम उत्तराखंड की मीडिया पर इतना क्यों लिखते हैं । इतना विपरीत क्यों लिखते हैं, निरंतर क्यों लिखते हैं। जान पाएंगे कि एक महिला के यहां पंद्रह अख़बार निकलते हैं । और वह ठग महिला इन अखबारो को वह ख़ुद भी नही पढ़ती। केवल विज्ञापन के लिए बंडल बनाए जाते हैं । वह इन सब में विज्ञापन लेती रही है। यानी बैठे बिठाए करोडपति। लेकिन इस राज्य में जिसे बनाने में 47 लोगों ने अपना बलिदान किया उसे इस महिला ने किस तरह लूटा खसौटा। उत्तराखंड में मीडिया के नाम पर ऐसे नगीने कई है। अब आइए एक दूसरी घटना के बारे में जाने। जो ज्यादा हृदय विदारक है।[ads1][ads1] एक बडे कहे जाने वाले मीडिया संस्थान ने कुछ साल पहले उत्तराखंड को विषय बनाकर एक विशेष पत्रिका निकालने के नाम पर सरकार से करीब 20 लाख रुपए लिए। सरकार ने यह सोचकर कि पत्रिका विशेष पत्रिका आएगी , लोगों को राज्य की जानकारी मिलेगी, कुछ पठनीय सामग्री होगी अच्छे लेख होंगे, संस्थान के नाम पैसा जारी कर दिया। संस्थान के समूह संपादक समाज और लोगों पर व्यंग्य करने के लिए व्यंग्याचार्य के नाम से जाने जाते हैं। पत्रिका छप भी गई। लेकिन पत्रिका का काम देहरादून में एक ऐसे गैर उत्तराखंडी युवक के हाथ सौंपा गया था , जिसे यहां के बारे में कुछ भी पता न था। लिहाजा पत्रिका में लगभग हर पेज पर बीस – बीस गल्तियां थी। गल्तियां भी छोटी से लेकर विकराल किस्म की। अगर यह पत्रिका लोगों तक पहुंचती तो बहुत हल्ला मचता । संस्थान की छिछालेदार होती। रातों रात किसी के जरिए सूचना मिलने पर व्यंग्याचार्यजी के स्तर पर पत्रिका को ही डंप कर दिया गया। बेचारे मालिक को कुछ भी नहीं पता कि पत्रिका कहां कहां पहुंची किन हाथों में पहुंची। समाज को भी इसका कुछ पता नहीं। यह भी पता नहीं कि पत्रिका किस स्वरूप में समाज तक लाई जा रही थी। सरकार के स्तर पर या संस्थान के स्तर पर। लेकिन आर्थिक नुकसान भी हुआ और जिन लोगों ने पत्रिका पर अपना समय – श्रम दिया, उनका भी अपमान हुआ। कायदे से पत्रिका को लोगों के हाथ तक न पहुंचा पाने के कारण समूह संपादक को उत्तराखंड की जनता को और सरकार को स्पष्टीकरण देना चाहिए था ।[ads1][ads1] साथ ही माफी भी मांगनी चाहिए थी। लेकिन शेखचिल्ली वाले अंदाज में रहने वाले समूह संपादक ने इसकी जरूरत नहीं समझी। यह उस अख़बार के हाल है जिसका उत्तराखंड की जनता के साथ वर्षों का नाता था। दोनों के बीच अपना मधुर तारतम्य परंपरा थी। लेकिन वो पुराने लोग अब नहीं रहे जो पत्रकार इसलिए कहे जाते थे कि वो खबर, लेख विश्लेषण साक्षात्कार सब कुछ लिखते थे । समाज और अख़बार के बीच की संवेदना को समझते थे। अब शेख चिल्ली टाइप के लोग है । जिन्हें देश के एक बेहद संवेदनशील राज्य के रुपय़ो को झटकते उन्हें शर्म नहीं आती, न अफसोस होता है। वो किसी बात पर शर्म करने के लिए जन्में भी नहीं है। उन्हें अपने बनाए नकली किलों पर ही ठसक रहती है। वे दरबार प्रेमी है। अपने कक्ष में घुसते हुए बादशाह सलामत का सा आभास पाले रखते हैं। पर हमारी उम्मीद है कि उस अख़बार की प्रतिष्ठा लौटे। उससे उत्तराखंड की भावनाएं जुड़ी है।[ads1][ads1] वहां का असभ्य हो चुका माहौल जल्द ठीक हो। ऐसा होगा भी क्योंकि नकली चीजें ज्यादा दिन नहीं चलती है। आखिर वज़न खरे सोने का ही होगा। और हम सब गौरा देवी , वीर चंद्र सिंह गढवाली माधो मलेथा, जसवंत सिंह बदरीद्त्त पांडे और गबर सिंह की भूमि के लोग है अपने मुल्क की लड़ाई आखरी क्षण तक लड़ते रहेंगे।दैनिक जागरण, अमर उजाला और जनसत्ता  में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार वेद विलास उनियाल की एफबी वॉल से. वरिष्ठ पत्रकार वेद विलास उनियाल पच्चीस साल से ज्यादा समय से पत्रकारिता कर रहे हैं. वे आठ राज्यों में और कई बड़े अखबारों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं.

वरिष्ठ पत्रकार : वेद विलास उनियाल

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