“पलायन गाथा” नकारा हुआ गढ़वाल, और नेपालियों को कह रहे डुट्याल

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ताश के पत्ते खेलते, शराब कारोबारी का मुनाफा बढ़ाते, 2300 करोड़ के रेवेन्यू टारगेट में योगदान देते, 27 नंबर और घोड़ा बीड़ी के धुएं से अपने फेफड़े फूंककर कोटद्वार के शिवदयाल गुप्ता की संततियों को धन धान्य पूर्ण करते पहाड़ के मर्द जब उन नेपालियों को देखते हैं जो अपने पुरुषार्थ के बूते बंजर ज़मीन में सब्ज़ियाँ उगाकर अपने बच्चे पाल रहे हैं तो बड़ी हिकारत से “डुट्याल” पुकारकर उनके पुरुषार्थ की हंसी उड़ाने से बाज़ नहीं आते।

वहीँ हमारी वीरांगनाएँ भी पीछे नहीं हैं, बन्दरों का बहाना बनाकर अपनी ‘सगोड़ि-पुंगड़ी’ से किनाराकशी करने वाली महिलाएं हरी तरकारी की जगह चाऊमिन और 2 मिनट के नूडल्स और अपनी गाय के दो ‘माणी’ आर्गेनिक दूध की जगह हरद्वार बुलन्दशहर के कारखानो से पॉलिथीन मेँ पैक सफ़ेद पानी से काम चलाकर या तो सीरियल देख रही हैं या मोबाइल कंपनियों का खज़ाना भर रही हैं। और आखिरकार “पहाड़ मेँ कुछ नहीं रहा” कहकर 3 से 5 बिस्वा मेँ कैद होने का बालहठ कर रही हैं उनमें nh-119(534) से सटे अमोठा के खेतों में नेपाली मेहनतकशों का खून पसीना साफ़ झलक रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति लगातार सुधर रही है। दूसरा चित्र sh-32 के अदवानी का है जहाँ नेपाली परिवार न केवल विषम परिस्थितियों मेँ खेती कर रहे हैं बल्कि पशुपालन भी कर रहे हैं, नतीज़तन उनके बच्चे माध्यमिक से लेकर उच्च शिक्षा भी ले रहे हैं, कार बाइक जैसे शौक भी पूरे कर रहे हैं, और हज़ारों नाली के “ज़मींदार” हैं कि “नीचे” 4-5 बिस्वा के लिए मुंड कपाल फोड़ रहे हैं… अब कहिये असल “डुटयाल”(मूर्ख मंदबुद्धि पिछड़ा) कौन….? 

 

वरिष्ठ पत्रकार :  अजय रावत 

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