“मोदी” को “दलाई लामा” समझने की भूल न करे चीन पढ़ें पूरी खबर

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  • सभी जानते हैं “दलाई लामा” ही तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं। लेकिन वर्ष 1949 में चीन द्वारा अपने साम्राज्य विस्तार के लिय शांतिप्रय आध्यात्मिक बौद्ध राष्ट्र तिब्बत पर चीन ने हमला कर दिया और तिब्बत की पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले ली । 1954 में तिब्बत के निष्कासित राष्ट्राध्यक्ष “दलाई लामा” माओ जेडांग, डेंग जियोपिंग जैसे कई बड़े चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए । लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं सुनी |
  • आखिरकार वर्ष 1959 में “ल्हासा” में चीनी सेनाओं द्वारा “तिब्बती राष्ट्रीय आंदोलन” को बेरहमी से कुचले जाने के बाद “दलाई लामा” अपना देश छोड़ कर भागने को मजबूर हो गये और विश्व के किसी भी राष्ट्र ने न तो उन्हें संरक्षण दिया और न ही उनकी कोई मदद की |“दलाई लामा” ने तिब्बत पर चीन के हमले के बाद “संयुक्त राष्ट्र” से भी तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की है। जिस पर “संयुक्त राष्ट्र संघ” द्वारा इस संबंध में 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए | किन्तु इन्हें भी चीन ने नहीं माना |
    तब भारत ने उत्तर भारत के हिमाचल प्रदेश प्रान्त के एक शहर “धर्मशाला” में उन्हें रहने का स्थाई स्थान दिया | जहाँ आज भी वह रह रहे हैं और यही से “केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय” बना का अपने अस्तित्व की पहचान बनाये हुये हैं | चीन इस वजह से भी भारत से चिड़ता है |
    “दलाई लामा” की इस पूरी कूटनीतिक असफलता का मूल कारण था उनका “आध्यात्मिक राष्ट्र अध्यक्ष” होना | अति आध्यात्मिक होने के कारण “दलाई लामा” ने कभी भी अपने देश की रक्षा के लिए विश्व स्तर पर किसी भी राष्ट्र के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं किये और न ही कभी किसी राष्ट्र को इतना विश्वास में लिया कि विपत्ति काल में वह राष्ट्र उनकी रक्षा के लिए खड़ा हो सके |

किंतु भारत की स्थिति से सर्वथा भिन्न है | भारत आध्यात्मिक होने के साथ-साथ कुशल राजनीतिज्ञ व कूटनीतिक राष्ट्र है | चीन के चारों ओर जो भी राष्ट्र हैं, वह सभी आज भारत के मित्र हैं | अगर भारत के ऊपर चीन अनावश्यक रुप से युद्ध थोपता है, तो भारत तो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ेगा ही साथ में भारत के मित्र राष्ट्र भी चीन पर राजनीतिक व कूटनीतिक दबाव बनाएंगे | जिससे चीन विश्व में अलग-थलग पड़ जाएगा और बहुत संभव है कि विश्व की अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां ही चीन के कई टुकड़ों कर डालें | क्योंकि चीन अब एक महाशक्ति के रूप में विश्व के लिए अपनी अति महत्वाकांक्षा के कारण बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है | जिससे सभी विकसित राष्ट्र चिन्तित हैं |
“जब भी कोई राष्ट्र एक मर्यादा से अधिक अपने साम्राज्य के विस्तार की कल्पना करता है तो वह राष्ट्र अपने शासक सहित नष्ट हो जाता है |” यह प्रकृति का नियम है | इसीलिए “जियो और जीने दो” का सिद्धांत ही मानवता के लिये श्रेष्ठ है |
अतः “मोदी” की तुलना “दलाई लामा से” करना चीन की बहुत बड़ी भूल होगी | भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक कुशल राजनीतिज्ञ ही नहीं “अंतरराष्ट्रीय कूटनीति” में भी पारंगत हैं | यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन काल में चीन भारत से लड़ने का निर्णय लेता है तो निश्चित रुप से भारत को एक बड़ी क्षति का सामना करना पड़ेगा | लेकिन बहुत संभावना है कि चीन के भी कई टुकड़े हो जाएं | चीन का अधिकाशं हिस्सा टूटकर रूस में चला जाए |
“संयुक्त राष्ट्र संघ” नये समीकरण में अपने पुराने आदेशों की अनुपूर्ति कराने के लिए “मित्र राष्ट्र सेना” के सहयोग से “दलाई लामा” को पुनः तिब्बत में स्थापित करने का निर्णय ले सकता है | जापान भी तकनीकी में चीन से कम नहीं है और चीन के साथ उसके राजनीतिक संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं | ऐसी स्थिति में जापान चीन को एक बड़ी आर्थिक और तकनीकी टक्कर दे सकता है | अफगानिस्तान भी भारत का मित्र है | उसे भी सीमा क्षेत्र में चीन से खतरा है | इसराइल भी इस युद्ध में कूटनीतिक सम्बन्धों के कारण भारत के साथ खड़ा होगा | ऐसी स्थिति में चीन को “मोदी” को “दलाई लामा” समझने की भूल नहीं करनी चाहिए वरना इसके परिणाम चीन के लिए भी बहुत भयंकर होंगे |

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