अमेरिकी शोधकर्ता स्टीफन फ्योल अपने उत्तराखंड के अनुभवों पर लिखेंगे पुस्तक

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उत्तराखंड की लोक वाद्य कला पर शोध करने वाले अमेरीकी शोधकर्ता स्टीफन फ्योल जल्द ही उत्तराखंड में अपने अनुभवों को पुस्तक रूप में प्रकाशित करेंगे. उत्तराखंड की लोक वाद्य कला पर शोध करने वाले अमेरीकी शोधकर्ता स्टीफन जल्द ही उत्तराखंड में अपने अनुभवों को पुस्तक रूप में प्रकाशित करेंगे। पिछले 14 साल से गढ़वाल व कुमाऊं के लोकवादकों से ढोल-दमाऊं सहित जागर वार्ता की महत्वपूर्ण जानकारी स्टीफन ने संग्रहित की है।

देवप्रयाग स्थित नक्षत्र वेधशाला शोध केंद्र में स्टीफन फ्योल ने योगाचार्य भास्कर जोशी से ढोल सागर के इतिहास व बारीकियों को समझा। साथ ही इस परंपरा के सिद्धहस्त लोकवादकों की जानकारी भी एकत्रित की.अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय में संगीत विभाग के प्रोफेसर स्टीफन फ्योल ने वर्ष 2003 में गढ़वाल क्षेत्र के लोक वाद्य ढोल-दमाऊं पर शोध शुरू किया था। इस सिलसिले में देवप्रयाग ब्लाक के पुजार गांव में लोकवादक सोहन लाल के यहां रहकर उन्होंने ढोल-दमाऊं की ताल, वार्ता व जागरों को भी सीखा।

यही नहीं, उन्होंने अपना नाम फ्योली दास रख गढ़वाली व हिंदी भी सीखी। सोहन लाल व उनके भाई संकरू को अमेरिका न ले जा पाने का मलाल स्टीफन को आज भी है। वीजा न मिल पाने से दोनों लोकवादक अमेरिकन छात्र-छात्राओं को ढोल-दमाऊं  सिखाने नहीं जा पाए थे। बाद में वह अमेरिकी छात्र-छात्राओं को उत्तराखंड की लोक कला से परिचित कराने के लिए लोकप्रिय जागर सम्राट गायक प्रीतम भरत्वाण को अमेरिका ले गए थे।

स्टीफन फ्योल बताते हैं कि 1930 में उनके दादा अपने चार बेटों को पढ़ाने मसूरी आए थे। बाद में उनके पिता अमेरिका में बस गए। भारत और उत्तराखंड स्टीफन के दिल में हमेशा रहा है। बाद में उन्होंने वाद्य यंत्रों पर शोध किया। अमेरिका में उनके कई शिष्य ढोल-दमाऊं जैसे लोक वाद्य बजाने में निपुण हो चुके हैं.स्टीफन पिछले साल सितंबर माह से जोशीमठ के पैनखंडा और कुमाऊं क्षेत्र में देवी-देवताओं के अलावा ढोल-दमाऊं आदि वाद्य यंत्रों पर शोध करने के सिलसिले में रह रहे हैं।

 

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