अधिष्ठायक देव श्री घंटाकर्ण महावीर जी के दर्शन लाभ से तो सभी परिचित होंगे, जाने इनके बारे में ?

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श्री घंटाकर्ण महावीर

अधिष्ठायक देवी देवताओं के इतिहास की जानकारी की कड़ी में आजहम अवगत करा रहे हैं श्री घंटाकर्ण महावीर के संक्षिप्त इतिहास से-अपने पूर्व जन्म में, घंटाकर्ण महावीर तुंगभद्र नामक क्षत्रिय राजा थे. वे धार्मिक बंधुओं, धर्म परायण स्त्रियों व कुंवारी कन्याओं की लूटेरों से रक्षा करते थे। वे तीर कमान का इस्तेमाल करते थे। इसीलिए इनकी प्रतिमा जी में तीर कमान विद्यमान होते हैं। उन्हें घंटे की ध्वनि बहुत पसंद थी व उनके कान घंटे की आकृति के थे इसलिए वे घंटा-कर्ण-महावीर ( महान योद्धा) कहलाये।तुंगभद्र कुछ लोगों ( जो की लूट और आतंक का निशाना बने हुए थे) की रक्षा के लिए लूटेरों से लड़ते हुए मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। वे पुनर्जन्म लेकर घंटाकर्ण महावीर में अवतरित हुए। गुजरात के बीजापुर के निकट स्थित महुडी नामक एक प्राचीन तीर्थ है।यह तीर्थ श्री घंटाकर्ण महावीर जैन मंदिर के लिए प्रचलित है व चमत्कारिक घंटाकर्ण महावीर देव को समर्पित है।पुराने समय में महुडी को मधुमती के नाम से जाना जाता था।खुदाई में प्राप्त मूर्तियों व कलाकृति के अवशेष इस स्थान के 2000 वर्ष पूर्व के इतिहास बताते हैं।

श्रीमद् आचार्य श्री बुद्धिसागर जी महाराज साहब के सानिध्य में इस तीर्थ की स्थापना हुई थी।आचार्य श्री ने जब देखा की जैन धर्मावलंबी अपनी मनोकामना पूर्ण हेतु व अपनी रक्षा के लिए इधर उधर अन्य मंदिरों, तीर्थों पर जा रहे हैं, तब उन्हें एक शक्तिशाली जैन देवता की आवश्यकता महसूस हुई लोगों की धार्मिक सहायता कर सकें व बुरी शक्तियों से उनकी रक्षा कर सकें।आचार्य श्री ने तीन दिन तक कठिन साधना व अपनी महत्त्वपूर्ण शक्तियों से श्री घंटाकर्ण महावीर को हवन अग्नि द्वारा प्रत्यक्ष किया तथा उन्हें लोगों के कल्याण रक्षा हेतु परिबद्ध किया।आचार्य श्री ने शीघ्र ही अग्नि में प्रकाशमान हुए घंटाकर्ण महावीर देव की आकृति बना डाली व आगे चलकर नदी तट के पत्थर से उनकी प्रतिमा जी बनायीं गयी क्योंकि राजस्थान से मार्बल पत्थर आने में समय लग जाता।श्रीमद् बुद्धिसागर महाराज साहब ने प्रतिमा जी में प्राण डालकर जीवंत किया।तब से लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण होते हुए महसूस किया व चमत्कार होते देखें हैं।52 वीर में से श्री घंटाकर्ण 30 वें वीर ( रक्षक देव) हैं। इनकी प्रतिमा जी बहुत ही चमत्कारिक हैं।हर दिन हजारों श्रद्दालु यहाँ अपनी मनोकामनाएं मन में लिए आते हैं।घंटाकर्ण महावीर सदैव उनकी रक्षा करते हैं जो उनमें आस्था रखते हैं।अपने पूर्व जन्म में उन्हें सुखडी बहुत पसंद थी इसीलिए आज भी प्रसाद के रूप में उन्हें सुखडी चढ़ाने की प्रथा है।यह सुखडी का प्रसाद मंदिर जी के परिसर के भीतर ही ख़त्म करना पड़ता है, मंदिर जी के बाहर नहीं ले जा सकते। यह मंदिर चमत्कारों के लिए इतना प्रसिद्ध है की हर वर्ष यहाँ लाखों धर्मावलम्बी आते हैं।हर वर्ष काली चौदस को यहाँ हवन का आयोजन किया जाता है जिसमें 200,000 श्रद्दालू सम्मिलित होते हैं।

कृष्ण चौदस सर्व शक्तिमान श्री घंटाकर्ण महावीर देव का कृपा दिवस है। इस दिन सात्विक मनोभावों, समर्पण एवं निष्ठापूर्वक देव दरबार में हर मनोकामना देवकृपा से अवश्य पूर्ण होती है। श्री घंटाकर्ण महावीर देव रोग, शोक, भय, संकट, प्रेत बाधा, अग्नि भय का निवारण करने वाले प्रभावशाली देवता है जिन्हें जैन, हिंदू और बौद्ध परंपराओं में समान रूप से विशिष्ट गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है।

श्री घंटाकर्ण को हिन्दू, बौध और जैन लोक हितकारी देवता के रूप में मानते है  श्री घंटाकर्ण को भैरव भी माना जाता है , कोणार्क सूर्य मंदिर के पत्थरों पर भी नाव में में नाचते हुए घंटाकर्ण भैरवों की प्रतिमा उत्कीर्ण है. एक प्रतिमा शांत भाव में है और एक रौद्र रूप में है. कामख्या आसाम में भी कामख्या मंदिर के नजदीक श्री घंटाकर्ण का मंदिर है. रविन्द्रनाथ टैगोर की एक कथा में श्री घंटाकर्ण का जिक्र है. दक्षिण भारत और गुजरात मे भी उनकी पूजा होती है , केरल मे कृष्ण लीलाओं मे उनकी कृष्ण से भेंट का निर्त्य नाटक मे वर्णन होता है. श्री घंटाकर्ण को यक्ष राज कुबेर का सेनापति भी माना जाता है. दक्ष प्रजापति के यज्ञ को जिन शिव गणों ने भंग किया था श्री घंटाकर्ण भी उनमे से एक थे.

  • श्री घंटाकर्ण की उत्पति के बारे में अनेक मत हैं पुराणो के अनुसार देवासुर संग्राम में जब शिव पुत्र स्कंध यानि कार्तिकेय को तारक असुर का वध करने के लिए जब देव सेना का सेनापति बनाया तो ब्रह्मा ने उनकी रक्षा के लिए चार महासक्तिशाली वीरों की उत्पति की जिनकी गति वायु की तरह थी और वो अपनी शक्ति को अपनी इच्छा से बढ़ा घटा सकते थे . इनमे से घंटाकर्ण एक थे . अन्य बीरों के नाम , नान्दिसेन, लोहिताक्ष और कुमुदमलिन है. वीर शैव मत के अनुसार घंटाकर्ण परा शिव के पांच लौकिक अवतारों में से एक हैं जो हर युग में पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और जो शैव परम्परा और ज्ञान को अक्षुण रखते हैं और इसका प्रसार करते हैं. इनके नाम रेणुका, दारुक, घंटाकर्ण , धेनुकर्ण और विस्वकर्ण हैं ये परम शिव के पांच भावो सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान के प्रतिक हैंकलि -युग में ये रेवानासिद्धा मरुलासिद्धा एकोरमा , पंडितअराध्य और विस्वराध्य के नाम से अवतरित हुए और इन्होने लिंगायत संप्रदाय का प्रतिपादन किया  सतयुग में ये एकाक्षर शिवाचार्य , द्वीक्षर शिवाचार्य, त्रि क्षर , शिवाचार्य, चतुसक्षर शिवाचार्य और पञ्चक्षर शिवाचार्य के नाम से जाने गए इस प्रकार श्री घंटाकर्ण कलियुग में एकोरम आचार्य के रूप में भीमशंकर लिंग से उत्पन्न हुए और उन्होंने केदार पीठ के स्थापना की इसी प्रकार अन्य आचार्य भी भिभिन्न लिंगो से प्रकट हुए.
  • श्री घंटाकर्ण को महाबल नाम से भी जाना जाता है  लिंग पुराण के अनुसार १७ वे द्वापर युग में जब भगवान शिव ने गुहा वासी के रूप में अवतार लिया तो उनके उत्तथ्य, वामदेव, महायोग और महा बल नमक पुत्र हुए जैन ग्रंथों में श्री घंटाकर्ण का नाम महाबल या तुंगभद्र बताया गया है जो रत्ना संचयी मंग्लावती नगर के राजा थे जो बाद में अभिनन्दन नाथ के रूप में प्रसिद्ध हुए  जैन गाथाओं में उन्हें ५२ रक्षक बीरों में से ३० वें घंटाकर्ण महाबीर के रूप में पूजा जाता हैं. उनका महूदी, गुजरात में एक मंदिर है जो पूरे भारत में जैन समाज में प्रसिद्द हैं. उनका महूदी, गुजरात में एक मंदिर है जो पूरे भारत में जैन समाज में प्रसिद्द हैं. एक अन्य कथा में उन्हें श्री नगर श्री पर्वत का राजा बताया गया है. जैन साहित्य में घंटाकर्ण की पूजा का विशेष विधान है और विभिन्न उपचारों मरण, मोहन, उच्चाटन, लक्ष्मी प्राप्ति, रोगों से मुक्ति के लिए घंटाकर्ण जी के मन्त्र का जप का विधान है. बौध (महायान) मत के अनुसार महाबल अमिताभ के अवतार हैं और उत्तर पश्चिम दिशा के दिक्पाल हैं

हरिवंश पुराण में श्री घंटाकर्ण के बारे में कहा गया है की जब भगवान श्री कृष्ण पुत्र रत्न की कामना लेकर भगवान शिव की आराधना के बद्रिकाश्रम पधारे  एक दिन जब वह नदी किनारे भ्रमण कर रहे थे तो उन्हें खाओ खाओ , बचाओ बचाओ और मारो मारो का कोलाहल सुनाई दिया  वह आश्चर्यचकित रह गए की इस निर्जन वन में ब्राह्मणों और ऋषियों के आलावा और कौन हो सकता हैं. वह रुक कर एक जगह बैठ गए तभी उन्हें मिर्गों की एक टोली भागती हुए देखी दी, जिनका पीछा कुत्तों का एक झुण्ड कर रहा था और उनके पीछे गर्जना करते हुए असुरों का एक दल दिखाई देता है जिनके साथ बहेलिये भी दौड़ रहे थे  उन सबके पीछे विशालकाय और कुरूप देह वाले दो दानव थे  इन लोगों के नजर जब भगवन कृष्ण पर पड़ी तो उन्होंने भगवन श्रीकृष्ण से पुछा की वी कौन हैं और वहां किसलिए आवए हैं. भगवन श्रीकृष्ण ने खा कि मई वासुदेव कृष्ण हूँ और द्वारिका से भगवन शिव कि तपस्या के लिए आया हूंतब भगवान् श्रीकृष्ण ने बड़े दानव से पुछा कि वे कौन हैं हैं और हिरनों का शिकार क्यों कर रहे हैं. तब बड़े दानव ने उत्तर दिया कि वह कुबेर के अनुचर है और शिव के भक्त हैं  बिष्णु से घृणा के कारन उन्होंने कानो में घंटियाँ पहन रखी थी ताकि विष्णु का नाम उन्हे गलती से भी न सुनाई दे. उनकी भक्ति से खुस होकर भगवन शिव ने जब उन्होंने बर मागने को कहा तो घंटाकर्ण ने भगवान् शिव से मुक्ति कि याचना कि. इस पर भगवान् शिव ने कहा कि केवल विष्णु ही मुक्ति प्रदान कर सकते हैं अस्तु उन्हें भगवान् विष्णु कि पूजा करनी चाहिए और विष्णु को मिलने द्वारिका जाना चाहिए  सो वे विष्णु पूजा हेतु मिर्गों का आखेट कर रहे हैं  इसके पश्चात घंटाकर्ण और उनका भाई विष्णु के ध्यान में बैठ गए उनके भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया आँखे खोलने पर उन्होंने कृष्ण को उसी रूप में देखा जैसा उन्होंने ध्यान में देखा था वह अत्यंत प्रसन्न हुए और नाचने लगे उन्होंने कृष्ण कि प्रसंशा कि और उन्हें ब्राहमण का ताजा मांस भेंट किया कृष्ण उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्होंने नम्रता से मांस कि भेंट लेने से मनI कर दिया उन्होंने घंटाकर्ण और उनके भाई को दिव्य रूप प्रदान किया घंटाकर्ण ने बार माँगा कि जो भी घंटाकर्ण कि विष्णु से भेंट के बारे में सोचेगा उसका मस्तिष्क और विचार शुद्ध हो जायेंगे कहते हैं किस विष्णु ने बर दिया कि तुमने हिंसा कर्म छोड़ कर मुक्ति चाही है तो तुम्हे इन्द्र के बाद मेरा धाम प्राप्त होगा.

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