हिमालयी जड़ी-बूटियों की खेती से सुधरेगी उत्तराखंड के किसानों की आय!

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इसी के मद्देनजर श्रीनगर के उच्च हिमालयी पादप संरक्षण केन्द्र में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा कार्यशाला का आयोजन किया गया है। कार्यशाला में हिमालयी जनपदों के काश्तकारों को जड़ी बूटी की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

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हिमालयी राज्य उत्तराखंड सदियों से सैकड़ों जड़ी बूटियों का भंडारण माना गया है। पूर्व काल से ही ऋषिमुनियों की तपस्थली रहे इस प्रदेश में जड़ी बूटियों का प्रयोग होता रहा है। संजीवनी बूटी समेत कई बूटियों का वर्णन हम बचपन से सुनते आए हैं, जब रामायण काल में लक्ष्मण की जान बचाने के लिए हनुमान संजीवनी बूटी के लिए हिमालय गए थे।
वैज्ञानिकों की माने तो आज भी हिमालयी क्षेत्रों में जड़ी बूटियों का बड़ा भंडारण मौजूद है। इन्ही जड़ी बूटीयों का संवर्धन व बड़े स्तर पर उत्पादन करने के लिए श्रीनगर के गढ़वाल विश्वविद्यालय में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया है। जिसमें प्रदेश के हिमालयी जनपदों के 100 से ज्यादा काश्तकारों ने भाग लिया। कार्यशाला में काश्तकारों को बताया गया कि कैसे वे जड़ी बूटियों की खेती से आर्थिक संकट दूर कर सकते हैं.
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बदलते मौसम चक्र से किसानों को ज्यादा फायदा नहीं
बदलते समय के साथ मौसम चक्र में आए परिर्वतन से सामान्य खेती में किसानों को ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है। साथ ही जंगली जानवरों के खेतों को नष्ट करने से काश्तकार अच्छी फसल से वंचित रह जाते हैं। जड़ी बूटी की खेती में जानवर इसे नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं, जो काश्तकारों के लिए फायदेमंद साबित होगा। काश्तकारों का कहना है कि वे समय-समय पर यहाँ आते हैं और जड़ी बूटी का प्रशिक्षण लेते रहते हैं।जड़ी बूटी के उत्पादन से लेकर विपणन तक की पूरी जानकारी विशेषज्ञों द्वारा दी जा रही है। वैज्ञानिक एमसी नौटियाल कहते हैं कि हिमालय के विशिष्ट क्षेत्रों में रहने वाले ये काश्तकार जड़ी बूटी से अच्छा रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। 15 साल पहले चमोली के सीमांत गांव घेस में चलाए गए शोध कार्य का ही परिणाम है कि आज घेस में जड़ी-बूटी की काश्तकारी स्थानीय लोगों को एक बेहतर रोजगार के रूप में उपलब्ध हुई है।

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