‘कौन था वो मुस्लिम नौजवान जिसने लिखी थी बद्रीनाथ मंदिर की आरती?

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 दुनिया में शायद ही कोई शख्स होगा जिसका कोई सपना न हो। मेरे तो कई सपने हैं। एक सपने का जिक्र मैं आपसे पहली बार कर रहा हूं। दुआ कीजिए कि वह जल्द पूरा हो जाए। मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं एक बार बद्रीनाथ के दर्शन करने जरूर जाऊं।

 

हमारे परिवार में इससे पहले मेरे नाना स्व. श्री भगवाना रामजी शर्मा वहां गए थे। वह कोई 50 साल पुरानी बात होगी, तब वे बद्रीनाथ मंदिर की एक तस्वीर लेकर आए थे जो आज तक मैंने बहुत संभालकर रखी है।

 

मैं अक्सर इस मंदिर के बारे में पढ़ता रहता हूं। एक बार मुझे इसके बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी मिली जो शायद आपको भी नहीं मालूम होगी। बद्रीनाथ मंदिर में एक खास आरती से भगवान का पूजन होता है- पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम …।

 

हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं, वे यह आरती भी जरूर सुनते होंगे लेकिन शायद ही किसी को पता हो कि इसका रचयिता कौन है।

 

आपको भी नहीं मालूम! कोई बात नहीं, मैं बता देता हूं। इस आरती को रचा था बदरुद्दीन साहब ने, जो एक मुसलमान थे।

 

उनका असल नाम फकरुद्दीन था। बाद में वे बदरुद्दीन साहब के नाम से मशहूर हुए। वे मूलतः चमोली जिले से थे। जहां तक मैंने उनके बारे में पढ़ा है, यह आरती उन्होंने 1865 में रची थी। कुछ इतिहासकार बताते हैं कि यह आरती उन्होंने उससे भी बहुत पहले रची थी। तब उनकी उम्र बहुत छोटी थी। 18 साल या उससे भी कम! किसी जमाने में वे नंदप्रयाग के पोस्टमास्टर हुआ करते थे। करीब 104 साल की उम्र में उनका इंतिकाल हुआ।

 

बदरुद्दीन साहब का मानना था कि दीन तोड़ने का नाम नहीं, बल्कि जोड़ने का नाम है। खुदा उस बंदे को कभी माफ नहीं करता जो तोड़ने का काम करता है, चाहे वह घर हो या मुल्क। खुदा उस बंदे से खुश होता है जो जुड़ाव और मुहब्बत पैदा करता है। यकीनन बदरुद्दीन साहब जुड़ाव पैदा करने वाले ऐसे ही एक नेक बंदे थे।

 

उनके लिखे शब्द कितने ही दिलों और आंसुओं में डूबकर भगवान की पवित्र प्रार्थना बन गए। क्या आरती के इन शब्दों को पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये हिंदू ने लिखे हैं या मुसलमान ने? आरती हो या अज़ान, वह किसी एक के लिए नहीं, सबके लिए होती है।

 

क्या होता अगर बदरुद्दीन साहब भारतीय न होकर अमरीकी या जापानी होते? क्या उस सूरत में उनके द्वारा रचे गए आरती के ये शब्द हमारे लिए पवित्र नहीं होते? जी नहीं, हम तब भी इस आरती को इतना ही मान देते। महत्वपूर्ण यह नहीं कि बदरुद्दीन साहब किस धर्म या किस मुल्क से थे, महत्व इस बात का है कि इन्सानियत को वे क्या देकर गए, उनका नजरिया कैसा था।

 

मुझे ताज्जुब होता है जब वसुधैव कुटुम्बकम् (पूरी धरती मेरा परिवार है) की तहजीब को मानने वाले मेरे हिंदुतान में कुछ लोग कहते हैं कि फलां महापुरुष या पैगम्बर तो विदेशी थे। हमारा उनसे क्या लेना-देना! खासकर पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के बारे में कहा जाता है कि वे अरबी थे, विदेशी थे। लिहाजा हम उन्हें अपना कैसे मान लें?

 

वे कहते हैं कि राम हमारे हैं, कृष्ण हमारे हैं, लेकिन हमारी सरजमीं से बाहर पैदा हुए किसी और महापुरुष को अपना बनाने के लिए हमारा दिल गवाही नहीं देता।

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