उत्तराखण्ड का हाल बेहाल, रो रहा है कर्ज के आंसू

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देहरादून
नवोदित राज्य उत्तराखंड को बने अभी मात्र 14 साल ही हुए हैं लेकिन प्रदेश विशाल कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है। राज्य गठन के समय विरासत में प्रदेश को 4 हजार करोड का कर्ज मिला लेकिन उसके बाद कर्ज बढते-बढते 40 हजार करोड के पास तक पहुँच चुका है। राज्य के विकास के लिए कर्ज सरकारें लेती गयी लेकिन पहाड़वासी आज भी विकास की राह देख रहे हैं
9 नवम्बर 2000 को उत्तराखंड देश में 27वें राज्य के रुप में अलग हुआ। उस समय प्रदेश को विरासत में 4 हजार 2 सौ करोड का कर्ज मिला। अंतरिम सरकार के रूप में भाजपा के नित्यानद स्वामी सूबे के पहले मुख्यमंत्री बने, लेकिन राज्य बनते ही राजनेताओं का कुर्सी का लालच सामने आने लगा। यही कारण था कि अंतरिम सरकार में ही नित्यानद स्वामी को हटाकर भगत सिंह कोशियारी को कुर्सी सौंप दी गयी।  2002 में पहली निर्वाचित सरकार के रूप में एनडी तिवारी मुख्यमंत्री बने और इस दौरान विकास के कई फैसले भी लिए गए। लेकिन ये सब भी केंद्र के पैसो और कर्ज के बदोलत किया गया। बहारहाल तिवारी सरकार के पांच सालों में कर्ज का बोझ लगातार बढता गया। 2007 में भाजपा सत्ता में आई तो विश्व बैंक,एडीबी और आन्तरिक कर्ज सरकार ने लेना शुरु कर दिया। वित्तीय वर्ष 2015-16 के बजट में कर्ज 34 हजार करोड़ पार कर चुका है। साफ है उत्तराखंड वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है। हालात इस कदर खराब हैं कि जल्द ही सरकार को वेतन देने तक के लाले पड़ सकते हैं। बावजूद इसके कांग्रेस सरकार से जुड़े लोग कर्ज को विकास का प्रतीक बताने में जुटे हैं।
नए राज्य के लिए चिंता की बात ये भी है इन 14 सालों में सत्ता में रही सरकारों ने फिजूल खर्च ही किया, सरकारें इन 14 सालों में आय के स्रोत नहीं ढूढ़ पायी । जबकि साल दर साल गैर योजना गत व्यय बढ़ते जा रहे हैं। सूबे की इस स्थिति के लिए बुद्दीजीवी राजनेताओं को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तराखंड को नवोदित राज्य होने के चलते स्पेशल केटगीरी में रखा गया, जिससे यहाँ की योजनाओं में प्रदेश की भागेदारी को महज 10 प्रतिशत करते हुए केंद्र ने कई योजनाओं में 90 प्रतिशत तक पैसा दिया। आज हालत ये है कि राज्य आर्थिक रूप से पूरी तरह से चरमरा गया है। ख़ास बात ये है की इन 16 सालों में प्रदेश पर राज्य करने वाली पार्टियाँ कोई नौसिखिया नहीं बल्कि राष्ट्रीय दल थे। आपको बता दें कि सत्ताधीन सरकारें राज्य में नई योजनाएँ तो नहीं ला पाई लेकिन योजनाओं के लिए आए पैसों को उड़ाया जरूर , जिसका नतीजा ये हुआ की राज्य धीरे धीरे कर्ज में डूबता गया। और सहज है की आज जिस प्रकार दोनों ही पार्टियां जनता के बीच अपनी अच्छी छवि को बनाए रखने के लिए यात्राएं किए जा रही है उसमें खर्च होने वाला बजट भी पार्टियों ने जनता की गाड़ी कमाई को व विकास कार्य के बदले का ही उड़ाया होगा। लेकिन अफसोस इस बात का है कि सत्ताओ में रहे दल अपनी गलती मानने को तैयार नहीं । भाजपा की माने तो कांग्रेस ने 10 साल सबसे ज्यादा समय राज किया लेकिन कोई ठोस कम नहीं किये इसलिए इस कर्जे का जिम्मेदार भी कांग्रेस को ही माना जाना चाहिए लेकिन भाजपा के पास इसका जवाब नहीं की क्यों भाजपा शासन काल में कर्जे का रेसो कम नहीं हुआ?

कहाँ से कितना कर्ज …..
आखिर प्रदेश पर इतना कर्ज का बोझ कैसे आ गया। प्रदेश में कई योजनाएं विश्व बैंक और एडीबी से लिये गये कर्ज द्वारा चल रही है जिसमें एनएचआरएम,स्वच्छता अभियान,स्वजल शामिल है।इसके अलावा भी आन्तरिक ऋण राज्य सरकार ने लिया है। एक नजर प्रदेश के कर्ज पर……
2001-02-4430.4 करोड
2002-03-5664.13
2006-07-12145.63
2011-12-21752.77
2015-16-34047.93
2017-18-46000 करोड(अनुमानित)
आपको इस खबर से स्पष्ट तो हो ही गया होगा कि प्रदेश में सरकार चाहे भाजपा की रही हो या फिर कांग्रेस की कर्ज लेने में किसी ने भी कंजूसी नहीं की, लेकिन इतनी बडी धनराशि कहां खर्च हुई इसका कोई हिसाब दोनों ही पार्टियों में नहीं है। यहाँ पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इतना कर्ज लेने के बावजूद आज पहाड़ों में बिजली, पानी, सड़क जैसी मुलभुत सुविधाएँ क्यूँ नहीं हैं । आखिर इतना पैसा कहाँ गया जो सरकार आज कई आंदोलनकारियों की मांगे पूरा नहीं कर पा रही है , जिस कारण आज हजारों लोग आंदोलनरत हैं और हमारे राज्य, व उसकी भावी पीढ़ी अधर में लटकी हुई है । ऐसे में विपक्ष फिर आरोप प्रत्यारोप में जुटाकर इसके लिए महज हरीश सरकार को दोषी ठहरा रहा है । जबकि क्षेत्रीय दल के रूप में यूकेडी ने भी मामले पर ताल ठोकते हुए राष्ट्रिय दलों की भ्रष्टाचारी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है।

 


 

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