इतिहास गवाह : बुरे वक्त में साथ देने वालों को भूल जाती है भाजपा

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देहरादून, भारतीय जनता पार्टी में आज कांग्रेस के बागी बेशक अपना उज्जवल भविष्य देख रहे हो लेकिन इतिहास गवाह है कि भाजपा ने अच्छे-अच्छे नेताओं का राजनीतिक कैरियर चौपट किया है। उत्तराखण्ड में इसके एक नहीं अनेक उदाहरण है। सबसे पहले भाजपा तेज तर्रार राजनेता टीपीएस रावत की राजनीति को अर्श से फर्श पर लायी थी। इसके बाद भाजपा ने उन दो वरिष्ठ नेताओं का राजनीतिक भविष्य चौपट किया जिन्होने वर्ष 2007 में भाजपा की सरकार बनाने में अहम रोल अदा किया था। इनमें उत्तराखण्ड क्रांति दल के कोटे से विधायक बने दिवाकर भट्ट व ओम गोपाल रावत शामिल हैं। आज इन दोनो ही नेताओ को भाजपा ने टिकट तक प्रदान नहीं किया। जिसके कारण ओम गोपाल रावत निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। वहीं दिवाकर भट्ट ने देवप्रयाग सीट से टिकट कटने को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। जब भारतीय जनता पार्टी बूरे वक्त में साथ देने वाले इन तीन नेताओ के साथ खिलवाड़ कर सकती है तो इस बात की क्या गारंटी है कि जो कांग्रेसी नेता आज अपनी ही पार्टी को छोड़कर भाजपा का दामन थाम रहे है उनके साथ वह वफा करेगी। कांग्रेस के 13 नेता भाजपा में बेशक अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित मान रहे हों किंतु भाजपा वो पार्टी है जिसने अच्छे अच्छो को अपना काम निकलने के बाद धूल चटा दी है।
गौरतलब है कि 18 मार्च 2016 को कांग्रेस के सितारगंज विधायक व पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुुगुणा, रूद्रप्रयाग विधायक व कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत, नरेंद्र नगर विधायक सुबोध उनियाल, रामनगर विधायक अमृता रावत, लक्सर विधायक कुवंर प्रणव चैम्पियन, रायपुर विधायक उमेश शर्मा काऊ, जसपुर विधायक डा. शैलेंद्र मोहन सिंघल, रूड़की विधायक प्रदीप बत्रा व केदारनाथ विधायक शैलारानी रावत ने भाजपा खेमे में शामिल होकर अपनी ही कांग्रेस पार्टी का दामन छोड़ दिया था। इसके बाद जब हरीश रावत को दोबारा बहुमत साबित करने का माननीय न्यायालय ने निर्देश दिया तो सोमेश्वर की कांग्रेस विधायक रेखा आर्य भी बागी होकर भाजपा में आ गयी थी। इन 10 विधायको के बाद अभी चंद दिन पहले ही कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य, उनके पुत्र संजीव आर्य व पूर्व विधायक केदार सिंह रावत ने भी दिल्ली पहुंचकर भाजपा का दामन थाम लिया था। 13 कांग्रेसियों के भाजपा में आने के बाद भाजपाई फूले नहीं समा रहे हैं। वहीं यह कांग्रेसी भाजपा में अब अपना राजनीतिक भविष्य तलाश करने में लगे हुए हैं। भाजपा ने अपने वायदे के अनुसार इन दल बदल करने वाले नेताओं को विधानसभा चुनाव में टिकट भी प्रदान कर दिए हैं। 13 में से किसके खाते में जीत दर्ज होनी है यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा इन सभी 13 के साथ वफा करेगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। इतिहास गवाह है कि जो लेाग दल बदलकर भाजपा में शामिल हुए उनके साथ कभी भी भाजपा ने ईमानदारी नहीं जतायी। एक नहीं तीन-तीन उत्तराखण्ड के नेताओ के साथ भाजपा ने अपना वक्त निकलने के बाद गद्दारी की है। गद्दारी करने की शुरूआत टीपीएस रावत के नाम से शुरू होती है। टीपीएस रावत एक फौजी आदमी हैं। सबसे पहले वर्ष 2002 में जब प्रथम बार विधानसभा चुनाव हुए तो वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते और तिवारी सरकार ने पर्यटन मत्री बने। पांच साल तक उनका कार्यकाल लाजवाब रहा। 2007 के दूसरे विधानसभा चुनाव में उनके खाते में पुनः जीत पहुंची लेकिन इस बार सरकार भाजपा की बनी और भाजपा हाईकमान ने सांसद भुवन चंद्र खण्डूड़ी को सूबे का मुखिया बनाकर उत्तराखण्ड में भेज दिया लेकिन भुवन चंद्र खण्डूड़ी विधानसभा के सदस्य नहीं थे इसलिए उन्हें विधायक बनाने के लिए किसी एक को अपनी सीट छोड़नी थी। लेकिन इसके लिए कोई भी भाजपा विधायक तैयार नहीं हुआ। भाजपा की डूबती नैय्या को डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने किनारे लगाया और भुवन चंद्र खण्डूड़ी के लिए कांग्रेसी विधायक टीपीएस रावत को भाजपा में मिलाकर उनकी सीट श्री खण्डूड़ी के लिए खाली करा दी। बुरे वक्त में भाजपा के साथ देने वाले टीपीएस रावत को भुलाने में भाजपा ने ज्यादा वक्त नहीं लगाया और आज हालात यह हैं कि टीपीएस रावत न भाजपा के हैं और न ही कांग्रेस के। दोनो के द्वार उनके लिए बंद हैं। इसके बाद भाजपा ने गद्दारी दिवाकर भट्ट व ओमगोपाल रावत के साथ की। देवप्रयाग सीट से टिकट मांग रहे फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट को एक किनारे कर भाजपा ने उनका टिकट काट दिया। वहीं ओमगोपाल रावत नरेंद्रनगर से टिकट मांग रहे थे। भाजपा ने उनका भी टिकट काटा और नरेंद्रनगर से सुबोध उनियाल को प्रत्याशी बना दिया। ओमगोपाल रावत व दिवाकर भट्ट वो व्यक्ति हैं जिन्होने वर्ष 2007 में भाजपा की सरकार बनाने मे अहम रोल अदा किया था। उस समय यह दोनो व्यक्ति उत्तराखण्ड क्रांति दल के विधायक थे। उन्होने भाजपा की सरकार तो बनायी लेकिन आज भाजपा उन्हें भूल चुकी है। जो पार्टी बुरे वक्त में साथ देने वाले इन लोगो को भूल सकती है क्या वह कांग्रेस से दल बदल कर आने वाले नेताओ के साथ गद्दारी नहीं कर सकती। कांग्रेस के 13 नेताओ को भाजपा की नीतियों से सीख लेने की आवश्यकता है क्यों कि अभी देर नहीं हुयी। वह चाहे तो अपनी गलती का सुधार कर सकते हैं।

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