पद्मश्री से सम्मानित होंगे जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण

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उतराखंड के जागर सम्राट के नाम से मशहूर नामचीन साहित्यकार गीतकार और लोककला एवम उत्तराखंड की लोक  संस्कृति को देश विदेश तक पहुँचाने को समर्पित जागर सम्राट डॉ प्रीतम भारतवान को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उनके नाम की दिल्ली में घोषणा हुई। इस पर देवभूमि वासियों में हर्ष का माहौल है।Related image

गांवों में पारंपरिक रूप से गाये जाने वाले जागरों को दुनिया भर के मंचों तक पहुंचाकर सम्मान दिलाने का श्रेय जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण को ही जाता है। उत्तराखंड के प्रत्येक जिले व गांव में लोग अपने अपने आराध्य देवताओं के दर्शन पा सके इसके लिए पूजा पाठ करते है,लेकिन ऐसी मान्यता है कि जागरों का देवताओं पर सबसे अधिक प्रभाव होता है। ऐसे में प्रीतम भरतवाण अकेले ऐसे गायक है जिनकी आवाज से देवता भी पवित्र व्यक्ति पर अवतरित हो जाते है। प्रीतम के प्रयासों का ही नतीजा है कि कभी औजी या दास (ढोलवादक) समुदाय तक सीमित रहे जागर आज न केवल समाज के सभी वर्गों में सुने और गाये जाते हैं बल्कि उन्हें पूरा सम्मान भी दिया जाता है। उनकी इन उपलब्धियों के लिए ही भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

प्रीतम भरतवाण ने दिया जागर को नया कलेवर
प्रीतम भरतवाण को लोक संस्कृति और संगीत को विरासत में मिली. प्रीतम के पिता और दादा भी जागर गायक थे और उन्हें ढोल सागर का काफी ज्ञान था. मात्र 5 साल की उम्र से प्रीतम भरतवाण लोक संगीत को नई ऊचाईयों पर पहुंचा रहे हैं. उत्तराखंड की जागर कला को उन्होंने एक नया रुप और नया कलेवर दिया. पहाड़ की दम तोड़ती जागर विधा को उन्होंने अपनी जादुई आवाज में नई पहचान दी. केवल जागर ही नहीं बल्कि पहाड़ की संस्कृति,रीति रिवाज,परम्पराएं और त्यौहारों को अपनी आवाज में नई लोगों तक पहुंचाया. प्रीतम भरतवाण के साथ कार्य कर चुकी लोक गायिका संगीता ढौंढियाल कहती है कि ये सम्मान पहाड़ के उन कलाकारों का भी है, जो सदियों से ढोल दमाऊ और जागर को गाते आते है. संगीतकार संजय कुमोला कहते हैं, प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री मिलने की काफी खुशी है और प्रीतम भरतवाण ने वास्तविक रूप से जमीनी स्तर पर जागर और पवाडों को संरक्षित करने के लिए कार्य किया.

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मात्र 5 साल की उम्र से संगीत की सीखना शुरू किया
प्रीतम भरतवाण ने मात्र 5 साल से ही थाली बजाकर पहाडी संगीत को सीखना शुरू कर दिया था. वे ना सिर्फ जागर गाते हैं बल्कि लोकगीत, पवांडा, और लोकगीत भी गाते हैं. प्रीतम लोकगायक ही नहीं बल्कि उच्च कोटि के गीत लेखक भी हैं. प्रीतम ने केवल लोकगीतों को गाया ही नहीं बल्कि पहाड के पारम्परिक वाद्य यंत्रों को बजाने में उन्हें महारत हासिल है. प्रीतम कहते है उन्हें ये कला अपने पूर्वजों से हासिल हुई जो सदियों से ढोल दमऊ को बजाते रहे है. वे ढोल, दमाऊ, हुड़का, डौंर थाली आदि कई लोक वाद्य यंत्रों के वादन में भी दक्ष है. प्रीतम का जन्म देहरादून के रायपुर ब्लॉक के सिला गांव में हुआ था. प्रीतम का जन्म एक औजी परिवार में हुआ है, जिस कारण लोक संगीत उन्हे विरासत में मिला है. उनके घर पर ढोल, डौर, थाली जैसे कई उत्तराखंडी वाद्य यंत्र हुआ करते थे. इसके साथ ही उनके घर में भी संगीत का मौहाल था. उनके पापा और दादा घर पर ही गाया करते थे. पहाड़ में होने वाले खास त्यौहारों में प्रीतम का परिवार जागर लगाया करता था. वहीं से उन्होने संगीत की ट्रेनिंग भी ली. प्रीतम भरतवाण की तीन बेटियां और एक बेटा है. उनकी पत्नी कहती है पद्मश्री पुरस्कार के एलान के बाद उन्हें काफी खुशी हो रही है. उनकी पत्नी रसना देवी पद्मश्री पुरस्कार के एलान के बाद से काफी भावुक है. वे कहती है उन्हें मां भगवती पर पूरा भरोषा था कि उनके पति को पद्मश्री पुरस्कार मिलेगा.

बचपन से ही उन्हें लोक संगीत में काफी रुचि थीRelated image
प्रीतम की शुरूवाती शिक्षा गांव के पास ही एक विद्यालय में हुई. संगीत के प्रति रूझान और उनकी कला की पहचान सबसे पहले स्कूल में रामी बारौणी के नाटक में बाल आवाज़ देने से हुई. बचपन में प्रीतम भरतवाण के गुरु उनके पिता हेमदास भरतवाण थे, जिन्होंने उन्हें लोक संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दी. उसके बाद उन्होने संगीत विद्यालय ऋषिकेश से शिक्षा ग्रहण की. प्रीतम भरतवाण बचपन से ही होनहार बालक थे. उन्होने मसूरी के एक नृत्य नाटक में डांस किया, जिसके बाद स्कूल के शिक्षकों पर उनकी नजर पड़ी. इसके स्कूल के बच्चों के साथ प्रीतम ने प्रिसिंपल की नजर जब प्रीतम पर पड़ी तो वे उनका हुनर पहचान गए. इसके बाद तो उन्हे स्कूल के हर कार्यक्रमों में गाने का मौका मिलने लगा. सबसे खास बात यह रही कि मात्र 12 साल की उम्र में ही उन्होने लोगो के सामने जागर गाना शुरू कर दिया था. इस जागर को गाने के लिए उनके परिवार के जीजाजी और चाचा ने उन्हे कहा था.

लोकसंगीत के लिए यह दौर काफी मुश्किल है: भरतवाण
जब अपने परिवार के लोगो के साथ शादी बारात में जाया करते थे. जहां उनके पिता और चाचा जागर लगाया करते थे. एक दिन जब आधी रात को जागर लगाते समय उनके पिता थक गए तो इसके बाद उनके पिता ने कहा कि प्रीतम अब इसके बाद तुम जागर लगाओं फिर प्रीतम ने ऐसा जागर प्रस्तुत किया सभी मन्त्रमुग्ध हो गए. यही संगीत के क्षेत्र में उनकी पहली परफॉमेंस थी. प्रीतम को पहली सफलता उनकी कैसेंट तौंसा बौं से मिली जो कि रामा कैसेट से रिलीज हुई थी. यह कैसेट 1995 मे निकली थी. इसके साथ ही उन्हे सबसे ज्यादा पॉपुलैरिटी सरूली मेरू जिया लगीगे गाने से मिली.  आज के वक्त में उत्तराखण्ड की संस्कृति प्रीतम भरतवाण के बिना अधूरी सी लगती है. प्रीतम भरतवाण के कई लोकगीत रिलीज हुए, जिन्हें दर्शकों ने काफी पसन्द किया, लेकिन उनका जागर नारैणी ने विदेशों तक में धूम मचा दी. उन्होनें कई लोक गायिकाओं के साथ काम किया है, जिनमें संगीता ढौंढियाल, मीना राणा प्रमुख है. लोकगायक और लेखक जितेन्द्र पंवार ने कहा कि प्रीतम भरतवाण दास समुदाय से आते हैं, जो पहाड़ों में ढोल दमऊ बजाते है. जब समाज और सरकारों की उपेक्षा से दास समुदाय ढोल और दमऊ को बजाने से परहेज कर रहे थे. ऐसे मौके पर प्रीतम भरतवाण ने ढोल-दमऊ को बजाना शुरु किया.Image result for pritam bharatwan

लोक गायक प्रीतम भरतवाण इन दिनों पहाड़ी संस्कृति का झंडा अमेरिका में बुलंद किए हुए हैं. अपने अमेरिका प्रवास में वह  ओहायो की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में अमेरिकियों को ढोल-दमौं की बारिकियां सिखा रहे हैं. श्री भरतवाण जी के उत्तराखंड के लोक संगीत में  उल्लेखनीय योगदान देखते हुए उन्हें उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी कुमायूं ने (डॉक्ट्रेट) मानद उपाधि से गवर्नर के हाथों सम्मानित किया है.

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